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शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

नशे का "इज्म"



विचार, रोटी,
प्यार, पानी और एक  नशा
क्या क्या जरुरी है ?
जीने के लिए, मरने के लिए
दिनों- दिन , जिंदगी भर के लिए..
मैं, वो और हम  सब...वो यानि
मिल में काम करता मजदूर...
और उसी  मिल का  मालिक
व्यस्त है इसी भागम भाग में
इसी जदो जेहद में....कि कुछ और मिल जाये
जो नहीं है अभी, या जो  होना चाहिए
और हो केवल मेरे पास...एक्सक्लूसिवली (न्यूज़ चेनलो की तरह)
इसी तरह हम सबकी....
 भूख मिटती नहीं सिर्फ रोटी से
और  प्यास बुझती नहीं सिर्फ पानी से
क्योंकि हम सबको हवस है
कुछ अतिरिक्त पाने की,
 ज्यादा जीने और
 कम से कम मरने की...
भले ही दुसरे के हिस्से को लूट  ले
शायद इसी को नए ज़माने में केपित्लिस्म कहते  है (survival of fittest)
केपित्लिस्म विचारो का,रोटी का,धरम,प्यार और पानी का भी...
बाकि बचा नशा,उसपे एक समय में एक ही  इज्म लगता है
क्योंकि वो कुछ और झेलने की हालत में नहीं है
मस्त है मलंग है अपने में...अलग अलग नामो से
कभी सुफिज्म तो कभी कम्युनिज्म  या सोसिलिज्म...



नोट-नशे की परिभाषा में कुछ मतभेद की गुन्जायिश है और नयी परिभाषा गढ़ने के लिए
       Narcotics Dept,Govt of India से अभी अनुमति लेना बाकी है!













शनिवार, 10 दिसंबर 2011

तुम एक गोरखधंधा हो...


Poet-Naaz khialaavi
Sung by-Ustad Nusrat Fateh Ali Khan

हो भी नहीं और हर जहाँ हो
तुम एक गोरखधंधा हो
हर जर्रे में किस शान से तू जलवानुमा है
हैरान है अक्ल की,  तू कैसा है और क्या है
तुझे गेरो हरम में मैंने  ढूँढा तू नहीं मिलता
मगर तशरीफ़ फरमा, तुझको अपने दिल में देखा है
 तुम एक गोरखधंधा हो

हरमो गैर में है जलवा ए पुर्फन तेरा
दो घरो का है चराग, एक रूखे रोशन तेरा
जब बाजुस तेरे दूसरा कोई मोजूद नहीं
फिर समझ में नहीं आता तेरा पर्दा करना
 तुम एक गोरखधंधा हो

जो उल्फत में तुम्हारी खो गया है
उसी खोये हुए को कुछ मिला है
न बुतखाने न काबे में मिला है
मगर टूटे हुए दिल में मिला है
अदम  बन कर कही छुप गया है
कहीं तू हस्त बन के आ गया है
नहीं है तू तो फिर इंकार कैसा
नाफीबी तेरे होने का पता है
जिसको कह रहा हूँ अपनी हस्ती
अगर वो तू नहीं तो और क्या है
नहीं आया ख्यालो में अगर तू
तो फिर मैं कैसे समझा तू खुदा है
तुम एक गोरखधंधा हो

हैरान हूँ इस बात पे तुम कौन हो क्या हो
हाथ आओ तो बुत हाथ ना आओ तो खुदा हो
अक्ल में जो गिर गया न इन्तहा क्यों कर हुआ
जो समझ में आ गया फिर वो क्यों कर खुदा हुआ
फ़लसफ़ी को बहस के अंदर खुदा मिलता नहीं
डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं
मिलते नहीं हो, सामने आते नहीं हो तुम
जलवा दिखा के, जलवा दिखाते नहीं हो तुम
गैरो हरम के झगडे मिटाते नहीं हो, तुम
जो असल बात है वो बताते नहीं हो, तुम
हैरान हूँ मेरे दिल में समाये हो किस तरह
हालाँकि दो जहाँ में समाते नहीं हो, तुम
ये महा बदो हरम ये खलिसा ओ देर क्यों
हरजाई हो, तभी तो बताते नहीं हो तुम
तुम एक गोरखधंधा हो

दिल पे हैरत ने अजब रंग जमा रखा है
एक उलझी हुई तस्वीर बना रखा है
कुछ समझ में नहीं आता की, ये चक्कर क्या है
खेल तुमने क्या अजल से ये रचा रखा है
रूह को जिस्म के पिंजरे का बना के कैदी
उसपे फिर मौत का पहरा भी बिठा रखा है
देके तदबीर के पंछी को उड़ाने तुमने
नामे तकदीर भी हर शब्द बिछा रखा है
करके आरैसे दो नयन के बरसो तुमने
ख़त्म करने का भी मंसूबा बना रखा है
ला मकानी का बहरहाल है दावा है तुम्हे
नह्लो अकरब का भी पैगाम सुना रखा है
ये बुरे वो भलाई ये जहन्नम वो बहिस्त
इस उलट फेर में फरमाओ तो क्या रखा है
जुर्म आदम ने किया और सजा बेटो को
बदले ओ इन्साफ का मियार भी क्या  रखा है
देके इंसान को दुनिया में खलाफत अपनी
एक तमाशा सा ज़माने में बना रखा है
अपनी पहचान की खातिर बनाया सबको
सबकी नज़रों से मगर खुद को छुपा रखा  है
 तुम एक गोरखधंधा हो

नित नए नक्श बना देते हो, मिटा देते हो
जाने किस जुर्म ए तमन्ना की सजा देते हो
कभी कंकड़ को बना देते हो हीरे की कली
कभी हीरो को भी मिट्टी में मिला देते हो
जिंदगी कितने ही मुर्दों को अत्ता की जिसने
वो मसीहा ही सलीबो पे सजा देते हो
खवाहिशे दीद कर बैठे सरे तुर कोई
खुद ही बर्के तजली से जला देते हो
नारे नमरूद में जलवाते हो खुद अपना खलील
खुद ही फिर नार को गुलज़ार बना देते हो
  तुम एक गोरखधंधा हो

About Poet: Naaz Khiaalvi

Real Name Muhammad Siddique, Takhalus Naaz and known as Naz Khialvi due to reason that he belongs to a village named as "Khiaali". Khiaali is about 5 Km away from Tandlianwala which is tehsil of Distric Faisalabad. Tandlianwala is 60 miles aways from Faisalabad.
Naaz Khialvi is doing Urdu and Punjaabi poetry since last 30 years (aprox). As he bolongs to a remote area, therefore he got less chances to come in lime light. His only source of income is a punjabi radio program "sandhal Dharti" which he is hosting since many years. The program is being broadcasted from Radio Faisalabad. Naaz sahib is of 55 years age (aprox) but he is still unmarried. His poetry has reached the level of "miraaaj" but the media is in control.
"Tum Ik Gorakh Dhanda hoo" was just a routine poetry for Naaz shaib, but became special due to Nusrat Fateh Ali Khan. Nusrat sahib belongs to Faisalabad and he had relations with radio people also. Somebody told him about Naaz sahib and he met Naaz sahib and requested personaly to write a qavaali for him. Naaz sahib did it for very little amount of money for Nusrat . How much revenue this qavali has earned? No body knows, it was a record breaking selling album. Same way Ata Ullah Niazi sung two cassettes comprising poetry of Naaz shaib. Both the cassettes were super hit. Naaz sahib asked Niazi that why he sung his poetry without his permission. In reply Niazi gave about 4000 rupees to Naaz sahib and he was more than happy.

Song link-http://www.youtube.com/watch?v=ZtiRNHGbOGg

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

अफीम

विश्वास और आस्था के प्रतिमान
एक दिन में ध्वस्त हो गये,और नास्तिकता
पूर्ण आस्था के साथ विद्यमान हो गयी
परन्तु  सम्पूर्णता के  खंडन का  दौर अभी भी जारी है
और  खंडो के इन अणु,परमाणुओ से शहर बदल गया है
क्योंकि बिना तालिबान के ही बरसो बरस पहले
बामियान के बुद्धा को तोड़ दिया गया था
तभी धीरे धीरे समझ आने लगा कि
क्यों एक दिन मार्क्स बाबा ने कहा था कि
धर्म और आस्तिकता अफीम के नशे की माफिक है
इसी से एक नया सिद्धांत निकाला है कि
 एक प्रकार के आस्तिकता रुपी  बिलों
से निकलने वाले जहरीले  सांप
 उजाड़ने का काम ही करते है
भले ही वो शहर हो, धर्म हो या एक आदमी
और इसके लिए तालिबान(अपने बुरे रूप में) की जरुरत नहीं है
एक अकेला तबलीग ही काफी है......
जो विचारो और भावनाओ  को अफीम में तब्दील कर दे





गुरुवार, 17 नवंबर 2011

kavita

क्या कविता होती है नकाब
दुःख की सुख की या कहे 
जिंदगी की उन सभी घटनाओ की
जिन्हें हम जीते, तो रोज है
पर बताना या जताना  नहीं चाहते
उन सभी को, जिनसे डर है
 किसी छवि के गिर जाने का या मिट जाने का
जिसे बड़ी मेहनत से बरसो से सम्भाल के रखा है
 या फिर, क्या कविता होती  है रंगमंच का एक पर्दा
जहाँ लिखने वाला परदे के पीछे रह कर
अपने दुखांत और सुखांत को
 बिंबो,प्रतिबिम्बों एवं प्रतिरूपों के रूप में
लिखता,सुनाता और दर्शाता है
कोशिश करता है वहां पहुचाने की
जहाँ और जिस के लिए लिखी है
इस उम्मीद के साथ कि,
 ये पहुंचेगी उसी अर्थ के साथ
जिस अर्थ के साथ लिखी है
पर दुनिया(अर्थ) अब बदल गयी है
लोग नकाब को छोड़ खुलेपन पे आगये है
और अब रंगमंच में अब गिने चुने लोग ही है
और वो आपस में ही नाटक- नाटक खेलते है 

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

शून्यता

सब कुछ सतही है 
उथला उथला सा और कम गहरा 
न कोई आधार और ना मूल 
जैसे कोई हो अमरबेल 
बढे, पले उसपे....और 
शून्यता की और 
बढ़ते हुए 
निर्बाध गति से अंदर ही अंदर 
गढ़ता  हुआ इतना गहरा की 
कोई देख न सके, कोई छू न सके 
पर फिर भी सब सतही है 
सूरज की उस रौशनी की तरह 
जिसकी विराटता खुली आँखों तक ही है 


शनिवार, 17 सितंबर 2011

Endangered species

जहाँ होता हूँ, वहां नहीं होता 
और जैसा होता हूँ, वैसा नहीं होता 
है ऐसी ही फितरत मेरी, 
इसलिए तो लोग कहते है 
अब तो अस्तित्व ही खतरे में है  
क्योंकि रोज की  तुलनात्मक भागम भाग में
हमेशा ही या तो एक कदम आगे रहा या पीछे 
और इसी उधेड़बुन में अब 
 ऐसी दुनिया में आ गया हूँ  
जहाँ के सारे जीव ही
प्राकृतिक रूप से सरंक्षित घोषित है 
हालाँकि कोशिशे बहुत है 
हम लोगो को बचाने की 
पर कुछ लोगों की ईमानदार कोशिशो पे शक है  
और कुछ हमें भी मरने का शौक है    

रविवार, 4 सितंबर 2011

अंतर्द्वंद

बातों का क्या है 
ये कह दिया और वो कह दिया
उनको और इनको 
पर मेरी ही बात मुझसे कहे, तू क्या है?
और क्या तेरी बिसात....
 मैं विश्वास तुझ पे करू
सच्चा तुझे मानू या झूठा 
बात की बातें सच्ची है
 मैं कुछ नहीं 
ना मेरी कोई औकात और ना कोई बिसात
एक निमित मात्र सा प्राणी मैं
अपनी दुनिया का अकेला वासी 
जो इसके केंद्र में भी और परिधि में भी 
अपकेन्द्रिय और अभिकेन्द्रीय बलों दोनों के जद में
गतिज भी और स्थतिज भी
बात की बातों की तरह
कभी उलझा और कभी सुलझा 
मन करे तब दुसरो की दुनिया में करू अतिक्रमण 
पर आने ना दूं किसी को अपनी दुनिया में 
क्योंकि बातों से ही घिर, गिर और फिर उठ जाता हूँ 
कभी अपनी तो दूसरों कि नजरो से
 मैं और मेरी बातें व्यस्त  है अपने द्वंद में
अपने अंतर्द्वंद में.....
क्योंकि  संघर्ष सदियों से जारी  है
 अंदरूनी प्रतिद्वंदता से.....




मेरी तो बहुत सुनी
 अब शहरयार साहिब की सुनते है
 http://www.youtube.com/watch?v=FyoKDxbbhIs&feature=related

रविवार, 28 अगस्त 2011

बातों का बन्तुलिया

लोग कहते है की, बड़ा अजीब सा है ये 
पर मैं तो खुद अपने जैसा ही  नहीं 
ऐसा भी नहीं, और वैसा भी नहीं
 फिर क्या उनको बताऊ मैं....
 क्या  था मैं? और क्या रह गया?
उन सबके ख्यालो और विचारों में
एक धुंधले से कन्फ्यूज विचार के तौर पे 
जो रेगिस्तान पर मंडराते बादल की तरह 
बेमतलब बेमियादी उडान भरता रहता है 
जबकि वो सभी, हाँ हाँ वो सभी लोग
निकल आये है समय की उस बस्ती से
जहाँ कुछ फूल  उगे थे, कुछ कलियाँ खिली थी 
मुरझाने के लिए, और बेमौत मर जाने के लिए
शायद पानी वहां का खारा था या मिट्टी माकूल न थी
क्या पता उनकी यही नियति थी या कुछ और परिणिती 
पर लोग कहते है खाम-खा का रोमान्तिसयिज मत करो यार 
क्योंकि तुम अभी भी मिट्टी का मन लेके घूमते हो 
और मन मुताबिक कलि या फुल उगाते रहते हो
पर ऐसा कुछ रियल जिन्दगी में होता नहीं है
शायद सच ही कहते है लोग.... 
और लोग कहते भी बहुत है 
या मैं लोगो की सुनता बहुत हूँ
कुछ तो बात है, बातों के इस बन्तुलिये* में 




*(बन्तुलिया )-रेत के बवंडर के लिए एक मारवाड़ी शब्द 




बुधवार, 3 अगस्त 2011

The Real "Globalfakir"

नुसरत फ़तेह अली खान 



नुसरत फ़तेह अली खान, 
वो नाम, वो चीज, वो आदमी, वो शख्शियत जिन पे कुछ लिखने की हमारी औकात नहीं है सिर्फ ये कह सकता हूँ की दुनिया में बहुत सी चीजो,व्यक्तियों को बदलते समय के साथ आप पसंद करते रहते  है पर एक समय के बाद मन में शंका के विचार आते है या आप उनसे बोर हो के नई राह पकड़ लेते है उनसे आप का मन भर जाता है या आपकी प्यास नए ठिकाने तलाशने लग जाती है  पर खान साहिब का संगीत ऐसी चीज है जिसको जब से सुना एक धीमे से मीठे से जहर  की तरह कैसे पूरे व्यक्तिव और सोच पर छा गया  है  मन और  दिमाग के एक कौने में अपनी एक परमानेंट जगह बना के बैठ गए! अगर मैं ये कहू  की मैंने कई सारी चीजे उनके संगीत की वजह से समझी है तो गलत नहीं होगा जैसे कि सूफी फिलोसोफी, इस्लाम, पाकिस्तान आदि आदि! नुसरत फ़तेह अली खान नाम में ऐसा जादू है की इसको सुनने, लोगो को सुनाने  में गर्व महसूस होता है हालाँकि ये चीज कई बार ये आदत दुसरे लोगो पे अपनी पसंद थोपने की बात तक पहुँच जाती है पर क्या हुआ इसी को तो दीवानगी कहते है कोई परेशां हो तो हो हम तो वो करेंगे जो हमे पसंद है, असल में उनके म्यूजिक को लेकर अंदर इतनी कन्विक्स्न है की जहाँ और जब भी  मौका  मिलता है उनकी पब्लिसिटी  में लग जाते है पर मैंने ये देखा है ऐसा सिर्फ मेरे साथ ही नहीं है बल्कि हर वो आदमी या मोहतरमा जो उनकी मुरीद है सभी इसी मर्ज के शिकार है मुझे उनके म्यूजिक की जो बात सबसे बड़ी लगती है की वो आपको एक नयी दुनिया (Intoxicated World)  में ले जाते है जहाँ आप होते हो, नुसरत की वो आवाज़ होती है  जिसे कहने वाले voice from heaven कहते है और सही  कहते है क्योंकि मुझे लगता है कि ऊपर बैठे दुनिया के सो काल्ड मालिक (GOD) भी शायद नुसरत के मुरीद है (अगर ये भगवान वगेरह कुछ है तो ) इसलिए तो उन्हें इतनी कम उम्र में अपनी महफ़िल  में बुला लिया बिना ये जाने की नीचे वालो का क्या होगा! पर क्या करे वो तो मकान मालिक है उनपे किसी हुकम थोड़े ही चलता है पर फिर भी नुसरत अपने पीछे वो खजाना छोड़ गए है कि उनके चाहने वालो के लिए तो इस जिंदगी के लिए काफी है और फिर भगवन भला हो यू ट्यूब  वालो का जिनके कारण आज नुसरत का इतना खज़ाना दुनिया भर के उनके मुरीदो को २४ घंटे उपलब्ध है इसे कहते है तकनीक का सही इस्तेमाल!



इसी महीने की 16 तारिख को उनकी बरसी है, 1997 के इसी दिन वो आवाज़ हमेशा के लिए शांत  हो गयी! कभी कभी सोचता हूँ कि वो लोग कितने लकी  होंगे  जिन्होंने उनको लाईव सुना और देखा! पर कोई बात नहीं जिसकी जैसी किस्मत उसको वैसा ही मिलता है ऐसा लोग कहते है! फिर भी शुक्र है भगवान का कि हमें किसी एक दिन वो सद्बुधी दी कि तुम नुसरत फ़तेह अली खान को सुनो और आगे तो फिर नुसरत अपना काला जादू सबपे चला ही देते है इस सबके के लिए ऊपर बैठे हमारी दुनिया रुपी मकान के मालिक का शुक्रिया! हमारे खान साहिब का ध्यान रखना.....अब सोच रहा हूँ कि यहाँ कौनसे गाने का लिंक पोस्ट करू....क्योंकि उनके बारे में लिखते समय I am wordless, speechless but overflowed with emotions of respect and love. इसलिए जो लिखना चाहता हूँ और जैसे लिखना चाहता हूँ  वो लिख नहीं पा रहा हूँ क्योंकि मन में बहुत कुछ उमड़ घुमड़ रहा है पर वो शब्द बन के बाहर नहीं आ रहे है! फिर भी कोशिश की अपने शब्दों को कपडे पहनाने की, सजा के, संवार के तैयार किया है! 

नित खैर मंगा 
.http://www.youtube.com/watch?v=QL3cqxY0gmY

मस्त कलंदर
 http://www.youtube.com/watch?v=UB4EuGvxDO0&feature=related

मैं  नि वे मेरा मुर्शद ऊचा---In this song little rahat fateh ali khan is sitting with khan sahib
http://www.youtube.com/watch?v=HTkwalTtwUk&playnext=1&list=PLA075B016E44EA1AC


यहाँ एक ब्लॉग का लिंक दे रहा हूँ जिस पर नुसरत के बहुत से गानों के lyrics संग्रहित है 

काश!




बुधवार, 27 जुलाई 2011

homogeneity

ये लोग, वो लोग, सभी लोग 
है मेरे साथ फिर भी मैं अकेला हूँ
कभी इनकी , कभी उनकी,  सुनता सबकी 
पर फिर भी मैं स्पीच्लेस हूँ 
धरती के साथ साथ रोज चक्कर लगा रहा हूँ 
पर फिर भी कई सालो से एक जगह पे अटका हूँ 
क्योंकि कोई चिंगारी लगाने वाला नहीं है
और  बातों के ढेर पे बैठा हूँ  मैं,
जिस दिन ये बारूद फटेगा
जल के इसमें एक नयी रचना होगी
राख के उस ढेर में मेरे, उनके सबके अवशेष होंगे
पर ढूंढना और पहचान करना बड़ा ही मुश्किल होगा
अच्छा है सभी एक जैसे हो जायेंगे







शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

mission moon

चाँद पे रहते है लोग 
अच्छे भी और बुरे भी
रात की रूमानी रोशनी में गौर से देखो तो 
कुछ लोगो को दिखते है 
कभी कभी आते है यहाँ सैर करने, घुमने 
खूब चाँद की बाते बताते है  
यहाँ की सुनते है  और एक दिन 
फिर वो ही अमावस के दिन चले जाते
कहते है कि तुम लोग बड़ा अँधेरा रखते हो
और हमें अँधेरे से सख्त नफरत है,
 गुस्से में कहते है कि  
हमारे चाँद में ऐसा नहीं है
वहां तो  चांदनी नाम की एक लडकी है
जिसके रूप के तेज से सब कुछ रोशन है 
ये अमावस, पूनम तो तुम्हारे यहाँ होती है
वहम है तुम लोगो का, मन बहलाने के लिए 
चांदनी रूठे तो काली अमावस नहीं तो पूनम  
चाँद वालो की बाते सुन कर सोचता हूँ
फिर ये 116 चाँद की रातों का चक्कर क्या है    
पता नहीं चाँद की जमीन कैसी होगी 
पहाड़ होंगे कि रेगिस्तान होगा पर 
सुना है वहां के लोग हवा में उड़ते है 
इधर से उधर जिधर मन किया 
और जिधर की हवा चले, चले जाते है 
कोई जुडाव नहीं सिर्फ और सिर्फ उड़ाव 
पहले तो वहीं से लोग आते थे 
अब विज्ञान की तरक्की  से 
हमारे यहाँ के  कुछ लोग भी कभी कभी 
चाँद पे चले जाते है
पर वापस आके वहां की असल बात कोई नहीं बताता 
 चांदनी की तारीफ करते रहते है 
और अजीब सी मदहोशी में सूफियाना मस्त हो जाते है
चाँद कैसा है और वहां के लोग कैसे है 
ये नहीं बताते, शायद मिले हुए है चाँद वालो से 
जिस दिन मै जाऊंगा 
सब कुछ पता करके आऊंगा 
या क्या पता मैं भी? 


Dedicated to Neha jee...


शनिवार, 2 जुलाई 2011

गली, मोहल्ले

गली, मोहल्ले


 बंद गली में बंद हूँ 
जाने का रास्ता है तो है 
पर निकलने का नहीं 
पर चुनी तो खुद ही, ये गली 
मैंने भी और बाकि सबने भी 
गली के उस पार, है बहुत से लोग
अपने भी, पराये भी और कुछ जाने पहचाने अनजान  
वो सब भी बंद है अपनी अपनी गलियों और मुहल्लों में 
 उनकी गली भी मेरी तरह है (मुहल्ले वाले तो खुश है ना )
हांजी हाँ बंद है एक तरफ से 
मन करता है, मिलना है  उनसे, बाते  करनी है  
कम्युनिकेसन का युग है आजकल, और फिर 
मैं भी सामाजिक हूँ न 
हूँ भी  या फिर गली की घुटन का असर है 
पर गलियों के भी अपने रूल रेगुलेशन है 
कोई इधर वाला उधर नहीं होता  
दिखने में बाहर से तो गलिया बंद है
पर मन के मोहल्ले मिले है आपस में 
पता नहीं कोन कहाँ का, और किसका 
अतिक्रमण कर चुका है, या कर रहा है  
बाहर से देख के लगता है 
एक सीजफायर सी स्थिति है 
जहाँ हर कोई अपनी अपनी गली के मोर्चे पर मुस्तैद खड़ा है 
पर मन से कहीं और मिला हुआ है
कहाँ ? ये तो गली वाले ही जाने.... 
अरे गली में कुछ खिडकिया ही खोल लो..... 
हवा आये ताजी इधर उधर....



तभी गली में गुलजार का लिखा गाना बजा.... 

रात के ढाई बजे....कोई शहनाई  बजे....दिल का बाजार लगा 
दिल ने कैसी दुर्गत की....पहली बार मुहबब्त की है
 अजी आखिरी बार मुहब्बत की है (गुलज़ार साहब  भी तंग आगये है)






रविवार, 19 जून 2011

सुंदरबन


कहता था मेरा एक दोस्त ...
जो मेरा वो तेरा,  पर मालूम है मुझे 
जो तेरा वो मेरा नहीं हो सकता  
है इतनी सी...... ये बात पूरी
 पूरी भी और अधूरी भी....पूरी कम अधूरी ज्यादा 
बड़ी भी और कभी छोटी और मामूली भी    
पर दिखती जितनी, उतनी छोटी है
शायद नहीं है,
 कन्फ्यूजन  है थोडा इसमें 
अनजान...अनभिज्ञ...
यानि स्यूडो संवेदी है हम सब      
देख के कहता था मेरा एक दोस्त..... 
ऐसे लोग होते है नए ज़माने के सूफी....
बिना बुल्लेह और बाबा फरीद के
बात करते है.... कबीर ते बाबे नानक दी
पर जीते है अपनी क्न्वीनिएन्स  से...
और बहाते चलते है अपने सूफी ज्ञान की गंगा
चाहे कोई डूबे या तरे...
और फिर एक दिन सुंदरबन पहुँच जाते है
जहाँ पेड़ की जडो को भी....
जमीन से बाहर आके सांस लेना पड़ता है










  
  

सोमवार, 13 जून 2011

island

 मन में है कई सारे टापू 
कुछ हरे भरे, और कुछ सूखे (मौसम के हिसाब से)
पर सारे एक से एक प्यारे सुंदर और रमणीय....जैसे की  इन्द्रलोक में हो  
और मैं इनपे कूदता फंदता रहता हूँ 
कभी इस टापू पे तो कभी उस टापू पर
सब में कुछ ना कुछ खास है ना 
बिना ये जाने की कौन मेरा है , और कौन पराया 
अरे पराया क्यों ? ये तो गलत बात है क्योंकि 
अब  तो ये सभी अपने है, आजकल दुनिया ग्लोबल विलेज है ना? 
इसलिए ये मेरे अपने प्रतिबिम्ब और मेरे अपने प्रतिरूप है  
 सागर के उन  बेटो की तरह.....
जो हमेशा रहेंगे भले ही कुछ भी हो जाये...
अपनी असीम गहराई और उथलेपन  के साथ 
भले ही डायनोसोर मरे या जिन्दा रहे.... 
और उन पर जुरासिक पार्के बनती रहे....
 पर आजकल खतरा एक नया पनप गया है 
हाँ सही समझे आप...... ग्लोबल वार्मिंग की बात कर रहा हूँ 
 जिससे कुछ टापू डूब रहे है, या सागर में समाने को है तैयार 
लोग कहते ये तेरे ये देश या टापू भी डूब जायेंगे 
बंगलादेश और मालदीव की तरह 
और तू क्या कर लेगा ?
 इस सबके बावजूद.... 
पर मैं जब कभी भी जाता हूँ इन टापुओ पर 
तो जीवन की एक नयी तरंग पैदा होती है 
परावर्तन और अपवर्तन के इफेक्ट के साथ....  
 क्योंकि मैं नहीं हूँ  दोषी, इस ग्लोबल वार्मिंग का 
पूछो उनसे जा के, जिनके कारण दुनिया आज गरमी खा रही है  
और जो करते थे, और आज भी करते है बाते दुनिया बचाने  की 
पर अंदरखाने शामिल थे, (और है) इस टापू भरी  दुनिया को डुबोने में
पर इतना बता देता हूँ उन सबको 
मैं नहीं डूबने दूंगा मेरे इन प्यारे टापुओ को 
क्योंकि मैं तो एक द्वीप प्रदेश हूँ  ना
और रूप बदल बदल के वही रहूँगा, यहाँ नहीं तो कहीं और 
चाहे रहू हिंद महासागर में प्रशांत में....
क्योंकि गहराई दोनों की एक समान है 
इसलिए कोई भले ही कुछ भी कहे.....मेरी बला से! 





शुक्रवार, 3 जून 2011

Everest

अपने अपने एवरेस्ट 

सुना है कि एक आदमी, नेपाल  का
पच्चीस बार एवरेस्ट पर चढ़ा है 
अरे भाई छोटे कद वाले परन्तु मजबूत इरादों वाले लोग है 
चढ़ सकते है कहीं भी, और किसी पर भी, एवरेस्ट क्या चीज है 
उसकी देखा देखी हम सब 
 मैं भी, तुम भी और ये पास में बैठी लडकी भी 
है ऊपर या नीचे परन्तु फिर भी  कोशिश  में लगे है 
क्योंकि सबका अपना अलग अलग एवरेस्ट है 
हर घर, गली-मोहल्ले और मन में है मौजूद 
 रोज चढ़ते है, और चढ़ते चढ़ते फिर गिर पड़ते है, 
गिरते ज्यादा है 
फिसलन  ज्यादा है ना शेयर मार्केट में आजकल 
इसी चढ़ावत गिरावट में शामिल हूँ 
मैं भी, तुम भी और ये पास में बैठी लडकी भी 
लडकी तो थोड़ी नादाँ और मासूम लगती है 
पर होशियार है बहुत, शेयर मार्केट की नोलेज है उसको 
और हम तो जानते ही एक दुसरे को क्या बताऊ मैं 
बरसो से साथ में है इस मिशन पर 
पर इन असफल कोशिशो के बावजूद उम्मीद है कि 
एक दिन तो पहुंचेंगे एवेरेस्ट के उस पर पार जन्नत या नरक में 
मै भी, तुम भी और ये पास में बैठी लडकी भी  
जहाँ कोई दुःख, कोई गम और मैं, तुम, ये लड़की कोई नहीं होगा
 क्योंकि जन्नत या नरक जो भी होगी, अपनी अलग अलग होगी ना 
और  हमें अपने अपने हिस्से का मोक्ष मिल जायेगा
 पता नहीं क्या मिलेगा, हमें क्या पता 
एक बार नेपाल के सुपर शेरपा  से पूछ ले क्या?
वो तो अनुभवी है ना.....   

रविवार, 22 मई 2011

caste census

मेरी जाति तेरी जाति 

        जाति और धर्म के आधार पर जनगणना को केबिनेट ने मंजूरी दे दी है इसका मतलब ये है अब सही सही ये पता चलेगा कि(मोटे तौर पे) देश में कोनसी जाति के कितने लोग है और देश में अलग अलग धर्म  के अनुयायियों की जनसँख्या कितनी है! वैसे कई लोग इस विचार के सख्त खिलाफ है की जनगणना जाति और धर्म के आधार पर  करने समाज जाति और धर्मो में बंट जायेगा और इस बुराई  को और बढ़ावा मिलेगा! ये विचार सुनने में बड़ा ही अच्छा है या कहे पवित्र है परन्तु इसका देश की  जमीनी सच्चाई से इसका  कोई लेना देना नहीं है! क्योंकि हमारा समाज सदियों से जाति और धर्मो पर बंटा हुआ है देश के बहुसंख्यक हिन्दू धर्म की पूरी व्यवस्था ही जाति आधारित है!
ब्राह्मण, क्षत्रिय.वैश्य और शुद्र, ये चार शब्द तो पुरे हिन्दू धर्म को पूरा क्लासिफाई करते है! देश के दुसरे अल्पसंख्यक धर्मों जैसे कि इस्लाम,ईसाई और सिख धर्म  इस बुराई से अपने को दूर बताते है परन्तु जाति इन धर्मो में किसी न किसी रूप में स्थापित है! हिन्दू धर्म से ईसाई बने आदिवासियों के साथ भी बराबरी का व्यवहार  नहीं होने की खबरे देर सवेर आती रहती है और इन लोगो की हालत तो त्रिशंकु जैसी हो जाती है क्योंकि धर्मान्तरित ईसायियो के साथ चर्चो में सौतेला व्यवहार होता है! ओड़िसा,केरला और नोर्थ इस्ट के राज्यों में अंदरखाने ये धर्म युद्ध तो ईसाई और हिन्दू संस्थाओ के बीच कई सालो से चल रहा है इन सबके मूल कारण में हिन्दू धर्म की जाति व्यवस्था है क्योंकि तथाकथित  निचली जातियों या दलितों के साथ बराबरी का व्यव्हार नहीं होता है इसी का फायदा दुसरे धर्म उठाते है और बड़े पैमाने पर धर्मान्तरण होता है! और फिर पुनः धर्मान्तरण  होता है! और ये खेल जारी है ! यहाँ तक कि बाबा नानक के सिख धर्म और पंजाब को भी गुरुद्वारों की राजनीती ने  विभिन्न डेरों और पन्थो  का घर बना दिया है जिसमे राधा स्वामी,बाबा राम रहीम ,निरंकारी  और रैदासी प्रमुख है  इन सबके जड़ में भी ये जाति ही है क्योंकि ऊंची जाति के जाट सिख गुरुद्वारों और अकाली आन्दोलन पर हावी हो गये है जिससे दुसरे सिखों ने अपने अपने नये डेरे और सेक्ट बना लिए है और इनमे आपस में संघर्ष चलता रहता है! इस्लाम में भी  ही ये ही ब्राह्मणी सोच  मुल्लाह मौलवियों ने अपना ली है यहाँ तक कि कुछ मुस्लिम जातिया  तो ओबीसी में शामिल है और आरक्षण का फायदा भी ले रही है! 

             इस देश का हर चुनाव् भले वो पंचायत  का हो  या लोकसभा का सभी जातीय समीकरणों पर लड़े जाते है यहाँ तक की अब तो अलग अलग जातियों और धर्मो की आकांक्षाये पूरी करने वाली पार्टिया अस्तित्व आ चुकी है और खुले तौर पर जाति या धर्म  विशेष की राजनीती करती है जिसमे बीसपी हो या केरल मुस्लिम लीग या लालू की राजद सभी शामिल है! ये तो सिर्फ उदहारण है इनकी लिस्ट बहुत लम्बी है! पर मजे की बात ये है की अगर कांग्रेस और बीजेपी जाति  के आधार पर उम्मीदवारों का चयन करती है तो इसे कहा जाता है इन पार्टियों ने उमीद्वारो के चयन में  सभी जातियों का ध्यान रखा है और अगर ये काम बीसपी या कोई क्षेत्रीय पार्टी करे तो उस  पर जातिगत राजनीति करने का आरोप लगाया जाता रहा है हालंकि अब तो मायावती भी सर्वजनो की बात करने लगी है! क्योंकि सिर्फ दलितों के वोट से यूपी पर शासन नहीं किया जा सकता है!

इस देश में आप जाति से कैसे इंकार कर सकते है क्योंकि जन्म से मृत्यु तक के हर काम में इसकी कदम कदम  पर  जरुरत पड़ती  है! यहाँ तक कि  सरकार की हर कल्याणकारी   योजना भले ही वो मनारेगा हो या राष्ट्रीय ग्रामीण स्वाश्थ्य मिशन हो सभी की कार्य योजना जाति और धर्म के आंकड़ो पर ही टिकी होती है इसीलिए इसकी प्रासंगिकता और बढ़ जाती है  देश के बड़े बड़े सेलेब्रिटीज ने  कहा है कि वो लोग तो अपनी जाति इंसानियत लिखवायेंगे! इन लोगो से पूछा जाना चाहिए कि इनमे  से कितने सेलेब्रेटी ऐसे है जिन्होंने जाति के आधार पर गाँव स्कूल कोलेज मंदिर या पानी पीने के सार्वजानिक स्थानों पर जातिसूचक अपमान सहन किया हो या तहसील में कई  दिनों तक चक्कर काट काट कर जाति प्रमाण बनवाया हो और फिर भी इंसानियत जाति के तौर पे लिखवाने की हिम्मत करते हो! असल में जाति क्या है इसको वो कभी समझ  नहीं सकता जिसने इसकी प्रताड़ना या अपमान नहीं झेला है! यहाँ तक कि जब भी कोई दलित या  महिला किसी बड़े ओहदे पर पहुचती है तो उनके काम की बजाय जाति और उसके जेंडर की चर्चा ज्यादा होती है! जैसे कि के. जी. बालकृष्णन  देश के पहले दलित सर्वोच्च न्यायाधीश है या पूर्व राष्ट्रपति  के. आर. नारानयन दलित समुदाय से आते है! या ममता बेनर्जी बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री  है उनके कार्यो,विचारों और सोच की कोई वेल्यु  नहीं है इनकी जाति और जेंडर ही इनकी यूसपी है! यहाँ तक अपने आपको प्रोग्रेसिव और लिबरल समझने और बताने वाली मीडिया जमात  में भी दलित और अल्पसंख्यको की बात को समझने वाले कितने लोग है ये बात तो सीसडीस (CSDS) द्वारा  कराये गए अध्ययन से साबित हो गयी है!  

जब देश  का संविधान जातियों के आधार पर समाज का वर्गीकरण  करता है तो जाति और धर्म आधारित  जनगणना में क्या बुराई है पता तो चलना चाहिए कि मनुस्मृती के अनुसार ब्रह्मा जी  के मुख से पैदा होने वाले कितने है और पैरो से पैदा होने वाले कितने है और कौन देश में अल्पसंख्यक और कौन बहुसंख्यक? और इतने सालो तक जिन्होंने देश पर राज किया और जिनके कारण आजादी के इतने सालो बाद भी बहुसंख्यक  लोग नारकीय जिंदगी जी रहे है और कुछ चंद लोग देश के हर संसाधन को लूट रहे है! अमीर और गरीब के बीच खाई बढ़ती जा रही है  जिसके कारण ही आज माओवाद और नक्सलवाद फ़ैल रहा  है!  और  ये भी एक सत्य है कि माओवादियों  के  निचले काडर स्तर पर  ज्यादातर लोग आदवासी और दलित  ही है! और आज लोकतंत्र को चुनोती दे रहे है! दुसरी मेनस्ट्रीम कम्युनिस्ट पार्टियों ने जाति की राजनीती नहीं की इसलिए पूरे उत्तर भारत की राजनीती में निल बटा निल है!

नब्बे के दशक में दो घटनाये ऐसी हुई है जिसने इस देश की राजनीती समाज सबको बदल के रख दिया है जिसमे एक तो वी पी सिंह का मंडल कमिशन द्वारा ओबीसी बनाना और आडवानी एंड फौज का बाबरी मस्जिद गिराना! जिससे देश में जाति और धर्म  को लेकर लोग ज्यादा मुखर हुए है और  बिहार, यूपी जैसे राज्यों में सत्ता सवर्णों के हाथ से गयी! देश में धार्मिक माहोल बिगड़ा! वैसे ये भी एक शोध का विषय हो सकता  है कि अयोध्या कांड में कितने कार  सेवक दलित थे या समाज के निचले तबके से आते थे! ओबीसी क्रियेट होने के बाद ही आरक्षण का मुद्दा गरमा गया है क्योंकि ओबीसी में शामिल जातियों की जनगणना पुराने आंकड़ो पर चल रही है जिससे रोज नए विवाद हो रहे है  यहाँ ये बात भी गौर करने लायक है कि  विभिन जातियों में बेकवार्ड होने की होड़ लगी है वो चाहे राजस्थान में  गुर्जर हो या हरियाणा  में जाट क्योंकि अब आरक्षण का फायदा सबको दिख रहा  है जबकी पहले इन जातियों को अपने को पिछड़े कहलाने में शर्म महसूस होती थी जबकि आज सभी किसी न किसी आरक्षण खांचे में घुसना चाहते  है! और इसका आधार क्या है उस विशेष जाति की जनसँख्या और उनकी आर्थिक सामाजिक परिस्थती! तो इसके लिए इनकी गिनती होनी भी उतनी जरुरी है! जिससे नए आंकड़ो के अनुसार उचित निर्णय  लिया जा सके! नहीं तो देश के कई राज्य कास्ट वार  की कगार पे खड़े है!

 यहाँ ये सोचने वाली बात है कि जिस देश में लोग पानी जाति पूछ के पिलाते हो, ट्रेन में खाना अपनी जाति वाले के साथ शेयर करते हो या गाँव में नाई बाल भी जाति के हिसाब  से काटता है और जहाँ भगवान के दर्शन में भी जाति आड़े आ जाती है उस समाज से जाति को कैसे हटायेंगे?   हाँ ये बात सही  है कि जाति और धर्म  निरपेक्ष समाज होना चाहिए, सोसिअल इक्विलिटी होनी चाहिए! तो ये कौनसी  नयी बात है ये बात तो भगवान बुद्ध,बाबा नानक और कबीर सदियों से कहते आ रहे है और होना भी चाहिए परन्तु इस कीमत पर नहीं कि  इतने समय तक ऊंची जातियों ने इस जाति व्यवस्था का फयदा उठाया  और आज जब पेंडुलम कुछ घूमता दिख  रहा है तो ये लोग जाति रहित समाज की बात करने लगे है! या अपने को पिछड़े साबित करने लगे है! ये तो वो बात हो गयी कि एक आदमी एवरेस्ट पर चढ़ा और नीचे  उतरते समय बाकी  चढने वालों से कह रहा है कि ऊपर मत जाओ वहां कुछ खास नहीं है! जब  जाति और धर्म इस देश और समाज की नस नस में है तो  इससे मुंह फेरना या इससे इंकार करना आँखे बंद करके दिन को रात समझने की भूल करने जैसा ही होगा! 
         

शनिवार, 21 मई 2011

hansee

हंसी के प्रकार 

मोहल्ले की रामलीला में 
सुनी और देखी है  कई तरह की  हंसी 
एक तो राम और रावण जैसी (हा हा) और 
दुसरी ऐसी जैसे की हंसी का  
कर लिया हो अपहरण किसी रावण ने (ही ही ही )
 देखा है कई बार ऐसा होते हुए अपने घर में भी 
पापा, भैया, दादा दादी हँसते तो घर हा हा से गूंज जाता 
पर दादी के सामने माँ, और माँ के सामने भाभी 
हंसती है तो हंसी की आवाज़ घूँघट में ही शरमा जाती 
पर अकेले में कभी कभी वो भी खिल के हंसती है तो 
रामलीला की अशोक वाटिका में  फुल खिल रहे होते थे 
और हमारे चाचा तो सभी तरह की हंसी हँसते थे
 हा हा, ही ही, हे हे, और हो हो 
मोहल्ले की राम लीला में राक्षस का रोल जो करते है चाचा
और चाची सूर्पनखा बनती है बिना नाक कटाए  
पर भाभी का छोटा मुन्ना तो रोता हो हो  करके 
ओर हँसता है तो प्यार से  हे हे करता है  
पर गुडिया मुन्ने से बड़ी है, मुस्कुराती ज्यादा है 
 आजकल स्कूल जाने लगी है , 
समझदार हो गयी है इसलिए हंसती कम है 
सुना है उसने
उस दिन भाभी बड़ी रोई थी और माँ उदास थी 
पर अब दादा, दादी तो रहे  नहीं
पापा,चाचा और भैया तो अब भी वैसे है 
पर माँ बदल गयी और उनकी हंसी भी 
पर भाभी अभी ही पहले जैसी है 
बदलने में वक़्त लगता है न, परन्तु  
सुना है और देखा है मायके में भाभी को 
अपने पापा की गुडिया बनते हुए 
और ससुराल की हंसी को मायके की बनाते हुए 
जैसे की राम, सीता को जीत के लाये हो वापस अयोध्या में 





मंगलवार, 17 मई 2011

band,baaja aur baarat


विकास और डेमोक्रेसी 
दोनों भाई-बहिन है बड़े खतरनाक, पर लगते बड़े सुंदर 
बहिन (डेमोक्रेसी) का मायका गाँव के पश्चिम में है 
तो भाई हर जगह अलग अलग नाम से भी जाना जाता  है 
 गाँव के सरपंच है इनके पापा, कई सालो से 
तो सरपंच साहिब अपनी प्यारी डेमोक्रेसी की शादी
किसी भी गाँव या घर में जबरदस्ती कर देते है
 क्योंकि वो मानते है डेमोक्रेसी सबसे सुशील कन्या है 
भले ही लड़के वाले दूसरी जात धरम के हो (प्रोग्रेसिव विचारों के है ) 
या लड़के की शादी पहले ही किसी से हो चुकी हो 
यहाँ तक की शादी तुडवा के नई शादी करवा देते है 
बड़े दबंग है सरपंच जी और उनके भाई (गाँव में चलती है )
 उल्टा दहेज भी वसूल कर लेते है (तेल ज्यादा प्रिफर करते है)
तेल का बड़ा पुराना धंधा है इनका,
इसीलिए लेन देन ठीक रहता है
 एक खास बात और  जहाँ दहेज का चांस नहीं होता,
वहां सिर्फ लड़की का गुणगान करते रहते है 
 शादी करने में ज्यादा इंटेरेस्ट नही लेते है 
और इनका लड़का विकास भी बड़ा दिलफेंक है
 किसी की भी लडकी पसंद कर लेता है
शर्त ये है लड़कीवालों के पास खूब जमीन होनी चाहिए
फिर सरकार, उद्योग,नौकर चाकर और पढ़ी लिखी बारात मिलकर 
 चिरंजीवी विकास की शादी करवा देते है
 बिना जात धरम देखे, (बताया ना काफी प्रोग्रेसिव लोग है)  
खूब मिठाई और पकवान बनाते है, और मिलजुल के खाते है  
 अब तो दूल्हा घर जंवाई क्या, वो वहां का मालिक बन जाता है 
सबके जुबान पे सिर्फ विकास का नाम होता है
पटवारी गाँव की ग्रोथ रेट डेली नापते है,
 और कहते है धन्य है विकास,आज तुम्हारे कारण 
गाँव विकासशील से विकसित हो गया है 
पर विकास है बड़ा सयाना, 
हमेशा नये नए नामो से शादी रचता है,
कानून से डरता है ना...........सच में?


रविवार, 15 मई 2011

gustaakhi maaf

      गुस्ताखी माफ़ 


पुरातन ज़माने में होता था कि राजा महाराज या काजी न्याय के लिए लिए अपना न्याय दरबार लगाते थे और दोनों पक्षों  की बाते सुन सुनाकर कर उनके वाद विवाद का निपटारा वहीँ हाथो हाथ कर देते थे यानि कि on the spot justice हो जाता था!

ऐसा ही एक समुदाय है जो वैसे तो हाल-चाल, वेश भूषा से हाई फाई आधुनिक है परन्तु उनके क्रिया कलाप और समय के बारे रिसर्च जारी है! इस समुदाय को देश में इलेक्ट्रोनिक मीडिया कहा जाता है यानि कि न्यूज़ को टीवी पे दिखाने वाले लोग और उनकी पुरी जमात!  जनता की आवाज़ के नाम पर इनको हर शाम को कोई न कोई बकरा चाहिए हलाल करने के लिए, भले ही उस बेचारे पे आरोप साबित हुए या नहीं हुए इससे इनको फर्क नहीं पड़ता! इन्होने तो अपना कोर्ट बिठा देना है जिसे अच्छी  अंगरेजी में मीडिया ट्रायल कहते  है इसमें इनका एक धुंआधार,खूंखार एंकर होता/होती है जो केस को सबके सामने रखता है और इनका साथ देने वाले रोज के वो जाने माने एक्सपर्ट जो दुनिया के किसी मुद्दे पर अपनी राय ऐसे देते है  जैसे की एक्सपरतीज की हर हर गंगा उनके घर से ही निकलती है! और ये सब मिलकर किसी को अपराधी या मासूम साबित कर देते है कम से कम  एक पोपुलर ओपीनियन तो बना ही देते  है!

 क्योंकि  पूरी दुनिया पे ये लोग एक खास हक के साथ सवाल  उठाते है जबकि इन पर कोई सवाल नही उठाता है जबकि इनकी खुद की क्रेडिबिलिटी दिनों दिन गिरती जा रही है! देश के किसी भी मीडिया हॉउस में रिक्रूटमेंट की कोई पारदर्शी पोलिसी  नही है न ही उनके रियल मालिको का पता है, ब्लैक और वाईट मनी,पेड़ न्यूज़,कोपोरेट लोब्बिंग जेसे कई आरोप इनपे लगते रहते है! इन सीरियस मुद्दों के बाद भी जिस फ्रीडम ऑफ़ एक्स्प्रेस्न का सहारा ये लेते है थोडा सा हम भी ले लेते है!

अपनी टीवी न्यूज़ मीडिया की ऐसी ही कुछ अदालतों और उनके खूंखार, जाने माने एंकरों का कुछ विश्लेष्ण किया है टीवी पर देख देख कर (हो सकता है असलियत कुछ और हो)  उनकी कार्य प्रणाली,अंदाज़ और हाव भाव पर कुछ टिप्पणिया की गयी है जरा शौक फरमाए-



अर्नब गोस्वामी (Times Now) - अर्नब साहब  रोज रात को अपनी अदालत  (The news hour) इतनी तेजी और हार्ड हिटिंग तरीके  से चलाते है जैसे की थोडा सा भी अगर हमने मिस कर दिया तो गोस्वामी वही बेठे बेठे हमारी सजा मुकर्र कर देंगे! एहसास करवाते है कि किसी भी मुद्दे पर इनकी बहस ही अंतिम होगी! और इनका फैसला भी अंतिम होगा! इसी आदत के कारण  प्रधानमंत्री की प्रेस मीटिंग में पीम के मीडिया सलाहकार हरीश खरे से डांट भी खाई! फिर भी इंग्लिश मीडिया का बेबाक चेहरा, इन्होने NDTV और CNN IBN  की मोनोपोली खत्म की है!

बरखा दत्त (Ndtv)- Buck stops here मदाम जी अब बक (दर्शक)  यहाँ नहीं रुकता) और 
                         We the people -ये कोनसे लोगो के लिए आप शो कर रही है पता ही नहीं चलता....
वैसे आपकी भी  हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी इतनी आलोचना के बाद भी पूरी........के साथ टिकी हुई है और हर शाम को उसी जोश के साथ अपने बक के साथ  आ जाती है! एक बात  और है जो लोग आपकी  सफलता से चिढ़ते थे वे लोग मौसम  का पूरा फायदा उठा रहे है! और सारी  खुन्नस निकाल रहे है! कुछ दिन सन्यास ले लो !

प्रनोय राय(Ndtv Group)-इन  डॉक्टर साहब को अपने चेनलो का इलाज करना चाहिए नही तो.....वैसे अब अप्रासंगिक हो गये है होना, नही होना कोई फर्क पड़ता, दुनिया आगे बढ़ चली है! कभी इंडियन न्यूज़ इंडस्ट्री में बड़ी इज्जत थी! देश में इलेक्ट्रोनिक मीडिया के शुरुआती लोगो में से एक है!

विनोद दुआ-(Ndtv)(मनोरंजन भारती के "दुआ साब")- किसी ने सही कहा था इनके लिए, ये पत्रकार नहीं ब्रोडकास्टर है!शायद रवीश कुमार के साथ अकेले है जिनके अपने नाम पे 15 मिनट का शो(महफिल) है, जबरदस्त टिप्पणीकार है बोलते भी शानदार है! हमेशा सुरूर में लगते है.............. बाबा की जय हो! 

करण थापर(devil's advocate)-  इनको लड़ते देख ऐसा लगता है कि अच्छा हुआ हमे इंग्लिश कम ही समझ में आती है! वैसे सही नाम है शो का, इन्हें तो वकील ही होना चाहिए! फिर भी टीवी पे कम ही आते है इसीलिए लोग सुनते है और देखते है! अपने हर शो से एक ब्रेकिंग न्यूज़ निकाल देते है!

राजदीप सरदेसाई (Cnn Ibn)- इनकी तो सारी जिन्दगी की कमाई Cash in parliament वाले मामले में चली गयी है रही सही कसर इनकी इन्तेलेक्चुल  वाईफ (सागरिका घोष) अपने शो और डिबेट से पुरी कर देती है! इंडियन मीडिया के पोस्टर बॉय, राडिया कांड में नाम आने के बाद भी लोगो इनसे उम्मीद है अभी भी अंदर का जर्नलिस्ट जिन्दा लगता है! पता नहीं है या नही? 

रजत शर्मा(India tv)-इन्होने कोनसे कॉलेज से पत्रकारिता पढी है उस पर  लोग रिसर्च करने में लगे है किसी को कुछ समझ में नही आ रहा है! वैसे इनको इस बात का श्रेय है की  हजारो लोगो को इन्होने जरनेलिस्म छुडवा दिया है और लाखो करोड़ो को ये भुलवा दिया कि न्यूज़ किस चिड़िया का नाम होता है! इनका नाम भी इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जायेगा!

पुण्य प्रसून वाजपयी(Zee News)-ज़ाहिर है , बड़ा सवाल ये है की.... हाथो को मसलते हुए कितने सालो से एक ही टेक में अटके हुए है  रोज सेमिनारो,ब्लोग्स और अखबारों में उसी मीडिया को गाली देते है और उसी में बने हुए है !  बाबा कुछ नया करो!

प्रभु चावला(New Indian Express)-जब हम लोग छोटे होते थे तो इंडिया टुडे के पेज पर इनका नाम पढकर सोचते थे की देश का कितना बड़ा इन्तेलेक्चुअल होगा ये आदमी,और जब पहली बार आज तक पे देखा तो सोचने लगे, ये इंडिया टुडे छपती कैसे थी यार? मीडिया के अमर सिंह कह सकते है इनको!

संजय पुगलिया(CNBC Awaaz)-पढ़े लिखे समझदार एडिटर लगते है काश इनके जैसे एडिटर सभी हिंदी चेनलो को नसीब होते! कम से कम ये स्योर तो है इनके चेनल पर क्या चलेगा!

पंकज पचोरी(Ndtv)-इनको आंकड़ो से बहुत प्यार है! बोलते बोलते कुछ भूल जाते है! अच्छे टीवी पत्रकार है!

विक्रम चन्द्र(Ndtv)-इन साहब की बिग फाईट से मजेदार तो WWF की  नुरा कुश्ती होती है, टेक गुरु भी है!बड़ी इच्छा है किसी दिन धुल भरे रिमोट एरिया में बिना एसी के रिपोर्टिंग करते देखू ! ये तो पैदायसी सेलेब्रिटी जर्नलिस्ट लगते है!

रवीश कुमार (Ndtv)- टीवी के सबसे क्रेदिब्ल  चेहरों में से एक है और आजकल पत्रकारिता को मजे ले ले के कर रहे है खूब व्यंग्य कर रहे है ....पर देख कर मजा आता है! लगे रहो  इसी तरह ....
वैसे बरखा कांड के बाद NDTV के दुसरे पत्रकारों की तरह इन पर भी हमले हो रहे है! लोग स्टेंड तो पूछेंगे.......बड़े पत्रकार जो हो! 

आशुतोष(Ibn-7) - ये और इनके जैसे कई  ईलेक्टोनिक मीडिया क्रांति के बाई प्रोडक्ट है! अच्छे एंकर है पर आगे कुछ नही...दिनों दिन लोकप्रियता गिरती जा रही है!


दीपक चोरसिया (Star News)-ये तो पत्रकार कम पान वाले ज्यादा लगते है पीपली लाइव में सही दिखाया है इनको.....स्टार वाले क्यों एंकरिंग करवा रहे है, रिपोर्टिंग  फिर भी लोग झेल लेते है!

अभिज्ञान प्रकाश और अभिसार शर्मा -इन दोनों को टीवी की आवाज म्यूट करके देखो या साउंड करके कोई फर्क नहीं पड़ता,इनको बोलना है क्या बोलना है ये पता  नही? पर आवाज़ दोनों की अच्छी.....पर हमेश एक जैसा साउंड करते है!

राहुल कँवल(Headlines Today)-ये तो अर्नब, राजदीप आदि  के पयिरेतेद वर्जन है! दोनों को कॉपी करने की कोशिस करते है ज्यादा गुन्जायिश नही है!

अशोक श्रीवास्तव (DD News)-अच्छे एंकर है और बहुत अच्छे से जानते है सरकारी चेनल में कैसे काम किया जाता है दूरदर्शन की पहुँच के कारण देश के कई बड़े एंकरों की तुलना में ज्यादा लोगो तक पहुँच पाते है! 


निधि कुलपति,नीलम शर्मा और अलका सक्सेना-नीलम शर्मा और अलका जी  तो अपने पे मोहित है दुनिया जाये भाड़ में...... निधि जी को सुनना अच्छा लगता है! 

अनुराधा प्रसाद(News 24)- ये मेडम तो  किसी मातम वाले परिवार से भी क्रिकेट का सवाल  पूछ सकती है! और फिर माहोल हल्का करने का क्रेडिट भी ले सकती है! विश्वास नही होता, ऐसे लोग भी एडिटर होते है! फिर इनके मातहत कैसे होंगे भगवान जाने?

किशोर अजवानी(Star News) -इनको मीडिया में भर्ती किसने किया था उसको ढूंढो....ये अगर न भी हो तो कोई  खास फर्क नही पड़ने वाला!

सुधीर चोधरी(Live India)-ये तो रजत शर्मा वाली परम्परा आगे बढ़ा रहे है क्योंकि  पहले साथ साथ में खबरे फोड़ते (ब्रेकिंग न्यूज़) थे आज कल उसी राह पे चेनल भी चला रहे है!

संदीप चोधरी (मुद्दा, IBN-7)- ये इतना चिल्लाते क्यों है? पता नहीं....ऐसा तो नहीं थोथा चना बजे घणा!

शम्स ताहिर खान (Aaj tak)-जुर्म, वारदातों  के बेताज बादशाह.....आवाज़ बढ़िया!


सईद  अंसारी (News 24)- इतने साल से  टीवी में चिल्ल पों कर रहे है पर डाउट है की लोग अभी भी सीरियासिली लेते होंगे!

श्वेता सिंह(Aaj Tak))-क्या है ये और क्यों है ये  समझ ही नही आता....किसी मीडिया सर्वे ने सबसे ग्लेमरस चेहरा बता दिया है! मेरी इस लिस्ट में क्यों है ये मुझे भी पता नही!



       
            ये कुछ खास और ज्यादा नजर आने वाले इलेक्ट्रोनिक मीडिया के चर्चित चेहरे है जिनको हम लोग रोज टीवी पर देखते है, हो सकता है कि सब लोग इनके बारे में उपर लिखी हुई बातो से  इतेफाक नही रखते हो परन्तु फिर भी टीवी के एक कट्टर दर्शक होने के नाते कुछ  फ्रीडम ऑफ़ एक्स्प्रेस्न तो ले ही सकते है! डेमोक्रेसी है भाई लोगो .......गुस्ताखी माफ़ करना!





शुक्रवार, 13 मई 2011

astronomy

चाँद के पार  

तुम क्या हो ,कुछ हो भी या सिर्फ एक विचार 
जिसका होना या न होना भी इतना जरूरी 
जितना स्वयं के अस्तित्व का होना 
परन्तु जब तुम नही तो, मैं 
बिना नासा के चाँद के पार चला जाता हूँ 
और थोडा बहुत सा गुरुत्व हीन हो जाता हूँ 
क्योंकि चाँद पे विचारो का टोटा है 
वैसे भी चाँद उम्र में धरती से छोटा है 
वापस जो फिर से अपने में लोटता हूँ 
आकाश गंगा के लाखो करोड़ो तारो की तरह,ये विचार 
और इनमे ध्यान रखना, उस खास विचार का 
 बड़ा मुश्किल है मेरे लिए तो, और तुम फिर से 
ध्रुव तारे जैसे सबसे ऊपर निकल के आ जाते हो 
और तुमसे बचते बचाते मै फिर से चाँद पार पहुँच जाता हूँ 
कहानी ये आज की नही, सदियों से ऐसा होता है  
 देख के लोग कहते कि मैं तो रिजिड सा  हो गया हूँ  
क्या कहूं मैं उनको, शायद अन्तरिक्ष विज्ञानं का ज्ञान नही उन्हें 
असल में चाँद, धरती का और मै चाँद का उपग्रह हो गया हूँ 
और उसकी कक्षा में अब परमानेंट स्थपित हूँ 
और चक्कर पे चक्कर पे लगा रियां हूँ 
चाहो तो इसरो या नासा वालो से पूछलो....



मंगलवार, 10 मई 2011

news of laden"s killing in marwari language

ओसामा बिन लादेन री मोत
२ मई! मारवाड़ री खबरां रेडियो बुलेटिन 

 हणो हणो एक ताजो ह्माचार मिल्यो है ज्केमे ओ केयो जा रिओ के दुनिया रो खतरनाक आतंकवादी ओसामा बिन लादेन  पाकीस्तोन रे एबटाबाद  शहर में मार दियो गियो है! अमरीकी कमांडो रे द्वरा करयो गयो एक मिशन रे मयो  काले रात रे  करीब  बारह  बज्यो घना सरा अमरीका रा कमांडो (खतरनाक फोजीड़ा) एबटाबाद रे एक मकोन माते हेलिकोप्टर ऊं उतरेया हन पचे  बापडे लादेन  रे माथे में गोली ठोक  दी जिन्सू लादेन उटे हीज मर गियो! बाद में अमरीकी सरकार  ने एक बयान जारी कर न इण खबर री पुष्टी करदी है  और बे केयो है कि इण रे बाद में लादेन ने अरब सागर में लिजा परों  न पुरे धार्मिक रीति रिवाज ऊ दफना दिंयो  है! ओ एबटाबाद शहर पाकीस्तोंन  री राजधोनी इस्लामाबाद रे खने ही है! और केयो जा रियो है कि लारले चार पांच सालों ऊं लादेन अटे ही  रह रियो थो! रात रे अंधारे में चालीस मिनट तक चलिए इण मिशन री खास बात आ है की पाकीस्तोंन ने इण घटना री जानकारी नी अन्केयी को होती नी!

शनिवार, 7 मई 2011

failed revolution

 एक असफल क्रांति 

जाने  वो भी क्या दिन थे 
जब हम भी कुछ कुछ दीवाने थे                         
करते कुछ थे, होता कुछ था 
फिर भी अपने पर बड़ा गुमां था 
सोचा था मिल के दुनिया बदल देंगे 
अंदरखाने कई कास्त्रो,चे और भगत जवां थे
खूब गुरिल्ला लड़ाई लड़ते थे   
पर है दुनिया का दस्तूर..... और धीरे धीरे 
 दुनिया कम्युनिस्ट से केपिटलिस्ट हो गयी
और..फिर ऐसी बदली कि.....  
खासमखास भी , खट्टे मीठे आम हो गए 
और इतिहास में दूसरी बार.... हाँ हाँ दुसरी बार   
 सोवियत संघ के तेरह टुकड़े हो गए 
 सारे कोमरेड, शामो-शाम  फ़कीर होने लगे और    
 भगत, कास्त्रो और चे  अपनी मौत मरने लगे
पर सुना है कि मार्क्स बाबा ने कहा था 
 एक दिन केपिटलिस्म अपनी मौत मरेगा 
और फिर सोवियत संघ फिर से एक हो जायेगा
नहीं तो दिल बहलाने का बहाना अच्छा है कि
असफल क्रान्तिया ही साची (सच्ची) और महान होवे है! 





गुरुवार, 5 मई 2011

osama

ओसामा तुमरे बिन 

ओसामा तुम चले गये सबको अकेला  छोड़कर  
वहां जहाँ तुम ही कहते थे कि एक जन्नत है 
कई लड़ाके और दुनिया भर के कई मासूम 
उस जन्नत में तुम्हारे कारण पहुचे थे 
तुम बताना हमें ये जन्नत कैसी है 
तुम हमेशा बाते बहुत कहते थे 
ऊँगली ऊंची कर कर के  
ऑडियो विडियो में जब बोलते थे 
सुनती,देखती थी  थी दुनिया पूरी
तुम से ज्यादा तुम्हारे टेप चलते थे
अरबी में  तुम्हारी  वो आवाज़ कानो को भाती थी
लगता था क्रांति की भाषा ऐसी ही होती है 
 क्रांति आसानी से समझ  में नही आती है न 
पर जोर्ज बुश की अंग्रेजी से तो अच्छी  थी  
 चलो कोई बात नहीं 
जहाँ तुम चले गये देखना वहां चे और सद्दाम  भी होंगे
 वो भी ऐसे ही गए तुम्हारी तरह 
दुश्मन तुम  सबका एक था पर और रहेगा  
पर लड़ाई चे की, तुम लोगो से अलग थी 
पर अब अल जजीरा, सीनेन और बीबीसी  वाले क्या करेंगे
ये बेचारे  कई कई दिन तक 
तुम्हारी बातो के मतलब निकालते थे 
तुम्हारे होने ना होने पर बहस करते, लड़ते पूरा जोर लगाके
और तुम मजे से बैठ के देखते थे न उनको, मुझे पता है  
चलो कोई बात नहीं 
 अब उन्हें  कोई नया ओसामा बनाना पड़ेगा 
पर वो इतना आसान थोड़े ही है
तुम्हे तो सब पता है 
कितना पैसा और ऊर्जा लगती है ( ऊर्जा को तेल पढ़े)
पर ये लोग तो माहिर है इसमें 
बना देंगे फिर कोई नया  ओसामा
पहले भी खूब इन्होने बनाये है 
और फिर  इनके सारे गुनाह तो माफ़ है 
तुम  चिंता मत करो इस बात की 
बाय बाय ओसामा याद आओगे सबको कभी कभी 
हर साल सितम्बर के महीने में!





battle of bengal

बंगाल और लेफ्ट 

कहते है की कार्ल मार्क्स ने एक किताब लिखी- "दास केपिटल"  और पूरी दुनिया को दो भागो में बाँट दिया एक तो वो जो इन विचारो से सहमती रखते है और दुसरे वो जो इसके खिलाफ है! परन्तु शीत युद्ध और सोवियत संघ के बिखराव से होते हुए येही वामपंथी विचार अब धीरे धीरे दुनिया के नक्शे से सिमटते  जा रहे  है और दुनिया के कुछ एक  देशो में ही लाल झंडा फहराता नजर आ रहा है इन जगहों में पिछले कई दशको से भारत का बंगाल, केरल और त्रिपुरा राज्य भी रहे है हालाँकि केरल में तो फिर सत्ता बदलती रही है परन्तु बंगाल में पिछले तीन दशको से सीपीम की सरकार रही जो देश के राजनीतिक इतिहास का एक रिकॉर्ड है परन्तु इस बार हो रहे विधानसभा चुनावो पर पूरी दुनिया की नज़र है ( विकिलीक्स के केबल्स से साबित होता है) ऐसा इसीलिए क्योंकि इस बार उम्मीद की जा रही है ममता, माओवादी, और  कोंग्रेस सब मिलकर सीपीम की मोनोपोली को ख़त्म कर देंगे! जाने माने पत्रकार एम् जे अकबर ने लिखा है की भारत में माओवाद का सबसे पहला शिकार सीपीम ही होगी! यानि की नंदीग्राम और सिंगुर की घटनाओ के बाद जो जमीन की लड़ाई में माओवाद और तृणमूल का गठबंधन दिखा है उससे ये साबित हो गया है पिछले तीन दशको में पहली बार ऐसा हो रहा है की ग्रामीण बंगाल में  सीपीम के काडर के सामने खड़े होने की कोई हिम्मत कर रहा है! 

पर ऐसा क्यों है की माओवाद  जो स्वय में  एक एक्सट्रीम कम्युनिस्म  है वो लिबरल कम्युनिस्म यानि की सीपीम को उखाड़ने पर तुला हुआ है क्योकि  मओवादियो की जो पहली मांग है लेण्ड रिफोर्म, और वो कार्य देश के किसी राज्य में हुआ है तो वो बंगाल की की ज्योति बासु सरकार ने ही किया है! पर जो उम्मीद इन वामपंथीयो से उनके साथी कोमरेडो को थी उस पर शायद वो खरे नही उतरे है और वो ही गुस्सा इस रूप में आ रहा है! इन सब विरोधभासो के बावजूद तृणमूल और देश पोपुलर मीडिया को लगता है की इस बार लाल किला ढह जायेगा और बंगाल में पोरिबर्तन होगा क्योंकि बंगाल की युवा पीढ़ी ने अभी तक अभी तक अपनी जिंदगी में एक ही सरकार देखी है! मेरे हर बंगाली दोस्त से जब भी पूछता हु तो वो सीपीम को ही बंगाल की दुर्गति का कारण मानते है और उनका गुस्सा इनके खिलाफ फुट पड़ता है! (कोलकत्ता में जब पहला मेक्डोनाल्ड का ढाबा खुला था तो वो भी एक खबर बनी थी)  
परिवर्तन तो पृकृति  का नियम है और होना ही चाहिए क्योंकि कहते है पानी बहता  हुआ ही अच्छा लगता है एक जगह पर रुका हुआ पानी सड़ जाता है भले ही वो कितना पवित्र क्यों न हो! सीपीम ने बंगाल में इतने साल शासन किया तो इसका एक मुख्य कारण माना जाता है इसके लोकल लेवल काडर की क्षमता  और अनुशासन! हालाँकि इसी काडर पर आज हिंसा,भ्रस्ताचार और भाई भतीजावाद में लिप्त होने के आरोप है साथ ही बंगलादेशी घुसपेठियो को  काडर में शामिल करने और ग्रामीण बंगाल में हिन्दू वोटरों को अल्पसख्यंक बना देने  के आरोप भी है!  और ये बात तो वामपंथी नेता भी मानते है की जिस काडर पर सीपीम को  गर्व था आज उसी के कारण बंगाल में उनकी हालत नाजुक है और इन्ही हालातो का पूरा  फायदा उठा रही है ममता बेनर्जी और उनकी तृणमूल कोंग्रेस!

 इन चुनावो में एक जो  बात देखने वाली है की सभी ने ये मान लिया है की बंगाल में लेफ्ट मोर्च हारने वाला है और इसीलिये बड़े बड़े रिटायर्ड अफसर और बिजेस्मेन तृणमूल के टिकट पर चुनाव लड़ रहे है जो अभी तक लेफ्ट की शरण में थे, क्योंकि जहाज के डूबने से पहले चूहे अपनी जगह बदलना जो चाहते है! साथ ही बड़े बड़े कोर्पोरेट होउसेस जिनको अभी तक बंगाल में ज्यादा कुछ करने को नही मिलता था अब उन्हें उम्मीद है की ममता सरकार आने के बाद राज्य में इंडस्ट्री के लिए माहोल बनेगा और उस बहती  गंगा में हम सब हाथ धोयेंगे क्योकि 1991 से देश में लागु हुए ग्लोबलाय्यिजेस्न के बावजूद बंगाल इस सब से कुछ हद तक अछूता ही रहा है, बीच में बुद्धदेब सरकार ने नेनो के मार्फ़त इसे लाने  की कोशिस की तो टाटा को विकास पुरुष मोदी जी के गुजरात में जाना पड़ा! वैसे ये भी बात है  जब पूरा देश मनमोहन जी की हार्डकोर आर्थिक नीतिया अपना रहा है तो उसी देश में आप अपनी सरकार वामपंथी विचारो से कैसे चला सकते है! समझोता तो करना ही पड़ेगा और फिर बंगाल के सोशिअल इंडिकेटर भी तो ठीक नही है शिक्षा, स्वास्थय,रोजगार जैसे हर मुद्दे पर बंगाल की हालत कोई अच्छी नही कही जा सकती! परन्तु ममता के लिए भी बंगाल को इतनी आसानी से पटरी पर लाना इतना आसान  नही होगा क्योकि जिन जमीन और इंडस्ट्री के मुद्दों के कारण सीपीम सत्ता से बाहर होने के कगार पे है उन पर सीपीम भी ममता को आसानी नहीं छोड़ने वाली है क्योंकि बंगाल में जमीन एक भावुक करने वाला मुद्दा है है आज का हर उद्योग जल,जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पे ही टिका है! और तब ये भी देखने लायक होगा की तृणमूल और माओवादी का आपसी व्यवहार कैसा होगा!  और माओवादी ममता सरकार पर क्या कहते है! पर क्या इस चुनाव के बाद देश में वामपंथीयो की प्रासंगिकता खत्म हो जाएगी, ये तो अभी भविष्य के गर्भ में है पर इतना तय है की लेफ्ट पार्टीयो को अब गहन चिंतन मनन करना  होगा और वक़्त के साथ अपनी राजनीतिक सोच और विचार में भी बदलाव  करने होगे ( बदलाव कास्त्रो के क्यूबा में भी शुरू हो गये है) और अपनी राजनीती को जेनयू की  बोद्धिक जुगाली से बाहर लाना होगा! 

क्योकि देश के गरीब,मजदुर,किसान और शोषित वर्ग को हार्डकोर पूंजीपति क्लास के भरोसे छोड़ना भी मोनोपोली बढ़ाना ही होगा! देश की मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी की जो हालत है उनसे तो एक सशक्त विपक्ष की उम्मीद करना बेमानी होगा! और इसीलिये लेफ्ट पार्टियों की इस देश की राजनीती को सख्त जरूरत है क्योकि लेफ्ट पार्टीया यूपीए सरकार में रहते हुए भी मनमोहन के लिए इतना बड़ा सरदर्द बने हुए थे जितना बीजेपी आज के भ्रटाचार माहोल में नही बन पा रही है!  

मंगलवार, 3 मई 2011

business of image

धंधा छवि गढ़ने का 

रामगोपाल वर्मा की फिल्म "कम्पनी " में एक गाना है " गन्दा है पर धंधा है यह" जी हाँ दुनिया का सबसे क्रिएटिव  और कमाऊ धंधा है बड़े लोगो,कम्पनियो,पार्टियों और हर बिजनेस  की छवि  बनाना  और बिगाड़ना! इसको ओपीनियन,पेर्सेप्सन या इमेज मेकिंग भी कह सकते है! शुरू करते है पार्टियों से कोंग्रेस सेकुलर पार्टी है बीजेपी हिन्दू पार्टी  है, बीसपी दलितों की पार्टी है या लेफ्ट पार्टिया गरीब मजदूरो की बात करती है! ये सब इन पार्टीयो की पोपुलर छविया या इमेज है परन्तु  इमेज अपने मूल रूप में गाढ़ी नहीं जाती है बल्कि कामो और घटनाओं और समय के हिसाब से बनती है परन्तु एक बार स्थापित होने के बाद मेंटेन की जाती है या अपनी सहूलियत से घटाई, बढ़ाई या बदलने की कोशिश भी की जाती है!  जैसे की गुजरात दंगो के समय नरेंद्र मोदी हिन्दू ह्रदय सम्राट थे और आजकल विकास पुरुष है! 1984 में सिखों का कत्लेआम होता है तो कोंग्रेस कुछ और थी और उससे पहले और बाद में सेकुलर! बीजेपी के लोह्पुरुष लाल जी भाई आडवानी तो इंडिया(अयोध्या)  में कुछ और जिन्नाह की कब्र पर कुछ और हो जाते है! सबसे मजेदार उदहारण तो मुलायम जी की समाजवादी जमात  जो  कभी अमरवादी होती है कभी अमिताभवादी, और अपने मूल में यादव वादी तो है! वही  अपने मेगा स्टार ऑफ़ दी मिलेनियम बिग बी  को कभी यूपी में जुर्म कम लगता है तो कभी कच्छ का रण अच्छा लगता है! इसी तरह से  बंगाल  में तो  इमेज बदलने के चक्कर  में तो  अब सरकार बदलने की तैयारी हो रही है! बहन मायावती के यूपी में दलितों पर अत्याचार और बढ़ गए है कम की बात करे ही क्या! अब सवाल  उठता है फिर ये घालमेल क्यों है! और ये  सिर्फ राजनीती में ही नही है समाज के हर क्षेत्र में है यह गोरखधंधा!

 इसको कहते है प्रोडक्सन ऑफ़ पेर्सेप्सन यानि की लोगो को विचारो और इमेज में इस तरह से बाँट दो की लोग उसी चश्मे हर चीज को देखे जिस चश्मे से आप उन्हें दिखाना चाहता है!इसी इमेज मेकिंग में हजारो लाखो करोडो की कम्पनिया चल रही है कोंग्रेस गरीब के हाथ को अपने साथ बताती है या बीजेपी मजबूत नेता और निर्णायक सरकार देने का वादा करती  है! पर क्या ये सब एक जुआ नहीं लगता जिस पर पार्टिया,कम्पनिया करोडो रूपये खर्च कर देती है हर बड़ी  कम्पनी  कुछ खास हीरो हेरोइन से अपने ब्रांड का प्रचार इसलिए करवाती है क्योकि उनकी एक खास इमेज है जैसे की जॉन इब्राहीम बाईक का एड करेंगे तो सलमान खान माचो बनियान  का और करीना साइज जीरो फिगर की! पर क्या इन कम्पनियों को  अपने खर्च किये पैसे का पूरा फायदा मिलता है जैसे की  फला हीरो के एड करने से किसी खास वस्तु  बिक्री बढ़ गयी है! पर  इस बिजनेस से जुड़े लोग कहते है की  इनको चुनने और भुनाने का एक मेथड है जिस पर ब्रांड पर्मोसन करने वाले अपनी हजारो सिगरेट और सुरीली शामे नष्ट करते है  बकायदा मार्केट रिसर्च और पब्लिक सर्वे किया जाता जाता है और फिर पूरा विज्ञापन और इमेज मेकिंग केम्पेन तेयार किया जाता है ! पर क्या भारत जैसे देश में ये सब इतना आसान है या अपनी सहूलियत के लिए इतना सिंपल बना दिया गया है उदहारण के लिए टेम वालो की टीआरपी सिस्टम के कारण देश को इंडिया टीवी और यूटीवी  बिंदास जैसे मेंटल टॉर्चर झेलने पड़ रहे है 
और इसके पीछे लोजिक क्या है टीआरपी सिस्टम? वो  भी देश के कुछ हज़ार  घरो में लगे मीटर के जरिए और इसके पक्ष में  कहा जाता है की लोग येही देखना चाहते है (लोग तो ब्लू फिल्म भी देखना चाहते है)
 तब जा के इस सारे मेथड पर शक होता है की क्या हमारे देश की जनता इतनी पागल है की इंडिया टीवी नम्बर एक न्यूज़  चेनल है! और उसी पे अरबो का विज्ञापन बिजनेस इधर से उधर होता है! इसी की देखा देखी  बाकि अच्छा काम कर कर रहे चेनल भी इसी चिरकुटई की होड़ पे लग जाते है तभी बड़े बड़े क्रिएटिव एड गुरुओ,इमेज मेकर्स  की क्रियेटिविटी और इरादों पर शक होने लग जाता है और सब कुछ सतही लगने लग जाता है!

 और  ये इमेज स्वत बनने की बजाय क्रियेट की हुई लगती है और तब ये सवाल उठता है की  क्या हम कोई इससे अच्छा तरीका या मेकेनिज्म नही बना सकते जिससे इस सब में कुछ पारदर्शिता आये और धंधा इतना गन्दा न लगे और हर चीज को उसकी सही जगह और इज्ज़त मिले! न की कुछ लोगो के हाथ में ऐसी  पावर की हम किसी को बना सकते या बिगाड़ सकते है!

अंत में देश के दो सबसे बड़े मजाक-
१. इंडिया टीवी देश का नम्बर वन न्यूज़ चेनल है 
२. वीर फिल्म की पटकथा (स्क्रिप्ट) सलमान खान ने लिखी है 







सोमवार, 2 मई 2011

khel gubbare

धोनी = डेविड बेकहम 

अभी कुछ ही समय पहले तक एक फुटबाल स्टार बड़ी चर्चा में थे, नाम था जनाब का  डेविड बेकहम! पोपुलर इतने कि दुनिया का बड़े से बड़ा ब्रांड इन्हें अपने साथ जोड़ने को बेक़रार था , फिल्म भी बनी इनके नाम पर "bend it like beckham" यानि कि बेकहम कि तरह फ्री किक मार  कर बाल को घुमाओ..... हायब्रिड फिल्म थी हायब्रिड कुल्चर के लिए!  नयी नयी हेयर स्टाइल वाले डेविड  पहले मानचेस्टर यूनाइटेड के लिए खेलते थे बाद में उन्हें स्पेन के बड़े क्लब रीयल मड्रिड ने बेहिसाब पैसा देकर खरीदा, यही वो समय था जब भारत में इंग्लिश प्रीमियर लीग की धूम थी बेकहम,फिगो और थियेरी ऑनरी के नाम की खूब टी शर्ट बिकती थी इधर  ईस्पीन और स्टार स्पोर्ट्स,  फुटबाल के मैच  दिखा दिखा के हमारी नयी पीढी को प्ले स्टेशन पर तो कम से कम फुटबाल खेलना सीखा ही  रहे  थे! कुल मिला कहे तो  बेकहम अपने चरम पर थे मैदान और मैदान के बाहर दोनों जगह, बाकी जो कसर बचती थी वो इनकी बीवी विक्टोरिया अपने जलवो से पुरी कर देती थी आखिर वो भी अपने आप में  एक सेलब्रिटी थी! स्पाईस गर्ल बेंड में जो थी!  उसी दौर में फुटबाल के हार्डकोर विशेषज्ञ इस बात पर बहस कर रहे थे क्या बेकहम इतने बड़े खिलाडी है या उन्हें योही गुब्बारें  की तरह फुलाया जा रहा, क्योंकि वो  फुटबाल की मार्केटिंग  कम्पनियों के लिए पैसा बनाने का एक जरीया मात्र है! हालाँकि बाद में हुआ भी ये ही गुबारे में से हवा निकलने लगी क्योंकि पहले तो  बेकहम इंग्लैंड की फ़ुटबाल कप्तान के तोर पर कोई खास कमाल नहीं दिखा पाए और इंग्लैंड की नेशनल टीम के बाद रीयल मद्रीद से होते हुए अमरीका के एक क्लब में जा पहुचे, और फिर धीरे धीरे स्पोर्ट्स कम्पनीयों ने भी  अपने नए बेकहम ढूंढ़ लिए! यहा बात यह है की बेकहम की खिलाड़ी के तोर पर योग्यता पर शक किसी को नहीं था परन्तु उनसे फुटबाल के अलावा बहुत कुछ खिलवाया गया,और वो भी खूब  खेले क्योंकि इसी में सबका फायदा था! पर क्या अगर ये सब एक संतुलित दायरे में  होता तो ये ही डेविड इंग्लैंड के लिए कम से कम  इतना अच्छा खेल के जाते जितना अच्छे  से एक स्पोर्ट्स ब्रांड आईकोन बन के गए! और दुनिया उन्हें एक शानदार खिलाडी के तोर पे याद रखती!

येही कहानी कुछ कुछ हमारे देश में दोहराई जा रही है भारतीय टीम  के क्रिकेट वर्ल्ड कप जीतने से पहले तक और किसी हद तक अभी भी मुझे ये लगता है की महेंद्र सिंह धोनी भी क्रिकेट के डेविड  बेकहम का रोले प्ले कर रहे है धोनी की एंट्री भारतीय क्रिकेट में उस समय हुई जब हम गांगुली के गोल्डेन एरा के ग्रेग चैपल नुमा चैप्टर में थे टीम से  सचिन,गांगुली,द्रविड़,लक्ष्मण और कुंबले की एक एक करके विदाई हो रही थी! ललित मोदी अपना आईपिल का सर्कुस लेके आये, icc की हालत bcci के सामने भीगी बिल्ली की तरह हो गयी! और भद्र लोगो का यह पुराना खेल अब शिल्पा शेट्टी,शाहरुख़ और प्रिटी के गोल गोल टोहो( dimpals) का हो गया यानि क्रिकेट की बीरयानी का फास्ट फ़ूड बर्गर बना दिया! और इस सबके लिए कुछ ऐसे हीरो तो चाहिये थे जिनपे लपेट कर इस नए क्रिकेट को परोसा जा सके और उस मेनू में हमारे धोनी जी पुरे फिट बैठते है! स्माल टाऊन  बॉय,न कोई पहले का  ईमेज बैगेज और कूल स्टाइल वाला यंग क्रिक्केटर जो आज के युवा की तरह बिंदास दीखता भी है और फिर क्या था सहवाग और युवराज जैसे सीनियरों के बावजूद कप्तानी द्रविड़ से धोनी की झोली में आ गयी! पर  क्या धोनी का एक खिलाड़ी के तोर पर ऐसा प्रदर्शन है की उन्हें टीम की कप्तानी मिल जाये! आंकड़े तो कुछ और ही कहानी कहते है! हालाँकि कप्तानी का रिकॉर्ड उनके स्वयं के गेम से अच्छा है! बेकहम  की तरह उनके पास भी हर तरह के ब्रांड्स  की भरमार है आईपिल टीम की कप्तानी है,  और धोनी जी कार,मकान, शेम्पू सब कुछ बेचते है उनका अपना एड कम्पनियों द्वारा गढ़ा हुआ  हेलिकोप्टर शोट भी है!

हालाँकि एड करना या इससे से पैसा कमाना कोई बुरी बात नहीं है दुनिया भर के सभी खिलाड़ी ये ही करते है  पर बात यह है की आप केवल स्पोर्ट्स मेनेजमेंट कम्पनियों के फुलाए हुए गुब्बारे  है या सचिन, लारा, ड़ी सिल्वा, लक्ष्मण,  अकरम, वार्ने या कुंबले जैसे महान खिलाड़ी है जिनको देखने के लिए लोग मेदान में जाते थे न की चीयर गर्ल्स  का बेहूदा डांस या उगडा हुआ बदन देखने के बहाने लोग आपको देखते है! सोने पे सुहागा   अब तो देश ने वर्ल्ड कप जीत लिया है, बड़ी खुशी की बात है परन्तु  ये गुब्बारे अब और फूलेंगे.....फूलेंगे! जब तक कोई नया धोनी न मिल जाये!  बेकहम और धोनी में फर्क सिर्फ इसी  वर्ल्ड कप जीत का ही है (कोई छोटा फर्क नहीं है) ...........उड़ो गुब्बारों हवा सही चल रही है!

हाँ अंत में एक बात और....... क्या विडंबना है की लक्ष्मण जैसा प्लयेर अपने केरीयर में एक वर्ल्ड कप नहीं खेल पाया और ये दिनेश मोंगिया,आशिस नेहरा,पियूष चावला जैसे खिलाड़ी वर्ल्ड कप की टीमो में खेले है!

रविवार, 1 मई 2011

shehar


मन कीं इन सभ्यताओ में 
है अब भी कुछ कही दबा हुआ सा 
बहुत सारे मुहनजोद्रो और हड़प्पा 
बसे हुए है या छुपाये है इन  टीलो के नीचे 
रोज बाहर आने को आतुर है वो शहर और वो लोग 
अकेले में इनकी खुदाई  होती है कभी कभी 
 हर बार कुछ न कुछ मिलता है गायब वहां पर 
डर लगता धीरे धीरे पूरी सभ्यता जीवाश्म न बन जाये 
फिर मांगने पड़ेगा ये सब वहां से, 
जहाँ जहाँ भी उम्मीद है इनके मिलने की
 बस रहे है नित नए शहर  इन पर, इसीलिए तो 
बड़ा मुश्किल है कुछ ख़ास सभ्यताओ को बचाना 
पर कहते  है कि जीवाश्म से ईंधन बनता है 
नयी पीढ़ी के कुछ कम आयेंगे ये मेरे शहर   

media

नए युग के संत 

हमारे देश और  समाज में एक जमाना था (पता नहीं हम तो  थे नहीं उसमे पर, किताबो में पढ़ा है और लोगों से सुना है) कि समाज और समुदायों में कुछ लोग ऐसे होते थे जिनकी बातों को लोग गंभीरता से सुनते थे या जिनकी बातों पर विश्वास करते थे या कहे कि ये लोग उस ज़माने के मार्गदर्शक या आज कि भाषा में ओपीनीयाँ मेकर होते थे या देश,समाज के लिए उदहारण प्रस्तुत करते थे और अपने कार्य कलापों और चरित्र में इनको धारण करते थे  इसीलिए  आज हम उन लोगो कि जीवनिया पढ़ते है और उनसे सीखते है एक आदर्श समाज के निर्माण के लिए किन किन बातों कि आवश्यकता होती है 

परन्तु आज के देशज समाज काल  में इस सबका एकदम उल्टा होता जा रहा है  नए युग के ये तथाकथित संत दुनिया को वे सारी बाते कहते है जिनका उनके स्वयं से दूर दूर तक कोई नाता नहीं होता हालाँकि दिखाने  कि पूरी कोशिश करते है वे ही इस देश और समाज के  सबसे बड़े विचारक, समाज सुधारक या फिर वाच ड़ोग ऑफ़ सोसाइटी, या फोर्थ पिल्लर ऑफ़ डेमोक्रेसी है! पर हकीकत इससे कोसों दूर कहीं राजस्थान के थार रेगिस्तान में पानी मांग रही होती है! जी हाँ मैं बात कर रहा हु आज के तथाकथित मीडिया मुगलों और बड़े सेलेब्रटी पत्रकारों की जिनसे समाज को बड़ी उमीदे थी पर आज की तारीख में ये सभी स्वयं भू न्यू एज संत पूरी तरह से नंगे हो गए है खास तोर पे नीरा मैडम के कांड के बाद तो ये मीडिया और राडिया में विभक्त हो गए है! सुनते है कि  बड़ी बड़ी सुनहरी इमारते  रातो रात भरभराकर गिर गयी है! और ये ही वाच ड़ोग अब लेप ड़ोग ऑफ़ कॉरपोरेट बन गया है!

बरखा दत्त,वीर संघवी,प्रभु चावला, राजदीप सरदेसाई, एम्  वेणु..... और जाने कौन कौन शामिल थे और अभी भी अंदरखाने शामिल है,एक जमाना था तब (ज्यादा पुरानी बात नहीं है ) ये सभी लोग देश के मीडिया छात्रो के लिए आदर्श बने हुए थे पर आज खुद एक आदर्श सोसायटी  घोटाला बन चुके है! हालत ये हो गयी की बरखा  दत्त को इंडिया गेट से छात्रो और आम जनता के विरोध के कारण शो (वो भी भ्रस्ताचार के खिलाफ ) किये बिना वापस भागना पड़ा! और स्मार्ट, बहकी हुई आँखों वाले देश के सबसे काम उम्र के संपादक रह चुके  वीर के तीर अब पता नहीं अब किस बार, होटल या रेस्टोरेंट में जलवा दिखा रहे है, अपने प्रभु जी की माया तो और भी निराली है अब इंडिया टुडे में  सीधी बात करने के बाद अब ई टीवी और इंडियन एक्सप्रेस में सच्ची बात करने चले गए है! और मजे की बात यह है की  ये लोग भ्रस्ताचार के खिलाफ बात करते है! वाह रे देश के एलिट पत्रकारों धन्य है आप हालाँकि आरोप लगने से कोई अपराधी साबित नहीं हो जब  परन्तु मीडिया तो पूरा ही क्रेद्दीब्लिटी या साख पर ही चलता है और उसके तो परखाछे उडा दिए गए है!

देश के हर मीडिया हाउस में अब लक्ष्मी  और सरस्वती का संतुलन गड़बड़ हो  गया है, मीडिया के छात्रो के लिए आदर्शो की कमी पड़ती जा रही है! कभी कभी तो ऐसा लगता है क्या हमे ऐसे बड़े मीडिया होउसेज  की जरुरत है जिनके अपने स्वार्थ सच्ची पत्रकारिता पर भारी पड़ रहे है! आज भी बड़ी से बड़ी स्टोरी छोटे छोटे पत्रकार और मीडिया संसथान ही ब्रेक करते जिसको बड़े सेलेब्रटी पत्रकार अपनी सहूलियत से हाईजैक कर लेते है! इसीलिए तो ऐसी बात नहीं है की देश में अच्छे पत्रकार है ही नहीं, परन्तु बात यह है कि उन संस्थानों में में उनकी बात कितनी  सुनी जा रही है ये भी एक क्रिटिकल बात है और इसीलिए न्यू मीडिया या अल्तार्नातिवे मीडिया जनम ले रहा है और खूब फल फुल रहा है अब तो हर आदमी पुब्लिशेर  है या ब्रोडकास्टर है!  मीडिया संस्थानों कि साख दिनों दिन गिरती जा रही है  फिर भीं भारत एक  विरोधाभासों  वाला देश है और यहाँ डेली एक मीडिया चैनल खुल रहा है या फिर मीडिया स्कूल खुल रहे है! सारे बड़े बड़े पत्रकार इसी मीडिया को खूब गरियाते है या सेमिनारो में इसके खिलाफ आग  भभकते है परन्तु शाम होते होते प्रेस क्लुबो के सुरूर और महंगाई भारी दुनिया में ये सारे आदर्श सुबह कि ड्यूटी के लिए ध्वस्त हो जाते है! और ये नए युग के संत अपनी अपनी श्रध्हा और क्षमता के हिसाब से प्रवचन और पूजा करने चल पड़ते है गोया कि देश और समाज को सही राह दिखाने का ठेका  जो इन्होने ले  रखा है! टेंडर भी खुद ही छापते हा और बिडिंग भी खुद  ही तय  करते है!

मुझे  लगता है कि अमेरिका के  सैनिक और इंडिया में जर्नलिस्म के नए नए  छात्र को ये मुगालता होता  है कि वो दुनिया कि बेहतरी और बदलाव  के लिए काम कर रहा है पर असलियत " रामगोपाल वर्मा कि शोले" जैसी होती है! हालाँकि रामगोपाल वर्मा में ये  दम है कि वो किसी भी दिन "सत्या" वाली वापसी कर सकते है!





mera blog

सभी बुजुर्गवर, पुराने और स्थापित ब्लॉगर भाई और बहनों को सादर प्रणाम!

बहुत दिनों से सोच रहा था की मैं भी इस नयी जमात ( मेरे लिए तो नयी ही है ) में शामिल होऊ और कुछ अपना भला कर सकू, कुछ नया सीख सकू, अपने दोस्तों का ब्लॉग देखा अच्छा लगा उनमे से कई लोग बड़े प्रतिभाशाली है और बहुत ही अच्छा लिखते है उन्ही लोगो से कुछ प्रेरणा मिली और ये नन्हा सा नौशखिया तैराक इस नए सागर में कूदा तो है  हालाँकि मेरा लिखने पर इतना अधिकार नहीं है पर इसी बहाने कुछ तो सुधार होगा, उम्मीद पे तो दुनिया कायम है  वैसे बड़ी मुश्किल से हिंदी में टाइप करने का तरीका ढूंढ़ पाया और मिलते ही  कुछ कुछ लिखने की कोशिश कर रहा हू!

तो आप सभी बड़े बुजुर्गो के आशीर्वाद से यह यात्रा आरम्भ कर रहा हू!
सादर प्रणाम!