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शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

अफीम

विश्वास और आस्था के प्रतिमान
एक दिन में ध्वस्त हो गये,और नास्तिकता
पूर्ण आस्था के साथ विद्यमान हो गयी
परन्तु  सम्पूर्णता के  खंडन का  दौर अभी भी जारी है
और  खंडो के इन अणु,परमाणुओ से शहर बदल गया है
क्योंकि बिना तालिबान के ही बरसो बरस पहले
बामियान के बुद्धा को तोड़ दिया गया था
तभी धीरे धीरे समझ आने लगा कि
क्यों एक दिन मार्क्स बाबा ने कहा था कि
धर्म और आस्तिकता अफीम के नशे की माफिक है
इसी से एक नया सिद्धांत निकाला है कि
 एक प्रकार के आस्तिकता रुपी  बिलों
से निकलने वाले जहरीले  सांप
 उजाड़ने का काम ही करते है
भले ही वो शहर हो, धर्म हो या एक आदमी
और इसके लिए तालिबान(अपने बुरे रूप में) की जरुरत नहीं है
एक अकेला तबलीग ही काफी है......
जो विचारो और भावनाओ  को अफीम में तब्दील कर दे





गुरुवार, 17 नवंबर 2011

kavita

क्या कविता होती है नकाब
दुःख की सुख की या कहे 
जिंदगी की उन सभी घटनाओ की
जिन्हें हम जीते, तो रोज है
पर बताना या जताना  नहीं चाहते
उन सभी को, जिनसे डर है
 किसी छवि के गिर जाने का या मिट जाने का
जिसे बड़ी मेहनत से बरसो से सम्भाल के रखा है
 या फिर, क्या कविता होती  है रंगमंच का एक पर्दा
जहाँ लिखने वाला परदे के पीछे रह कर
अपने दुखांत और सुखांत को
 बिंबो,प्रतिबिम्बों एवं प्रतिरूपों के रूप में
लिखता,सुनाता और दर्शाता है
कोशिश करता है वहां पहुचाने की
जहाँ और जिस के लिए लिखी है
इस उम्मीद के साथ कि,
 ये पहुंचेगी उसी अर्थ के साथ
जिस अर्थ के साथ लिखी है
पर दुनिया(अर्थ) अब बदल गयी है
लोग नकाब को छोड़ खुलेपन पे आगये है
और अब रंगमंच में अब गिने चुने लोग ही है
और वो आपस में ही नाटक- नाटक खेलते है