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गुरुवार, 17 नवंबर 2011

kavita

क्या कविता होती है नकाब
दुःख की सुख की या कहे 
जिंदगी की उन सभी घटनाओ की
जिन्हें हम जीते, तो रोज है
पर बताना या जताना  नहीं चाहते
उन सभी को, जिनसे डर है
 किसी छवि के गिर जाने का या मिट जाने का
जिसे बड़ी मेहनत से बरसो से सम्भाल के रखा है
 या फिर, क्या कविता होती  है रंगमंच का एक पर्दा
जहाँ लिखने वाला परदे के पीछे रह कर
अपने दुखांत और सुखांत को
 बिंबो,प्रतिबिम्बों एवं प्रतिरूपों के रूप में
लिखता,सुनाता और दर्शाता है
कोशिश करता है वहां पहुचाने की
जहाँ और जिस के लिए लिखी है
इस उम्मीद के साथ कि,
 ये पहुंचेगी उसी अर्थ के साथ
जिस अर्थ के साथ लिखी है
पर दुनिया(अर्थ) अब बदल गयी है
लोग नकाब को छोड़ खुलेपन पे आगये है
और अब रंगमंच में अब गिने चुने लोग ही है
और वो आपस में ही नाटक- नाटक खेलते है 

1 टिप्पणी:

desitypes ने कहा…

Dear Ramesh,

Tumhare kavita se lagta hai...Kavi thode darpok hote hain...jo chahe ghuma phira ke baat karte hain ya chip chip kar. Lekin, apni baaton ko shabdon me likh dena hi bahot badi kala hai...aur Kavi hamesha hero hi hote hain.

Achcha likha hai...baat mein dum hai.

:)

Nalini