मन कीं इन सभ्यताओ में
है अब भी कुछ कही दबा हुआ सा
बहुत सारे मुहनजोद्रो और हड़प्पा
बसे हुए है या छुपाये है इन टीलो के नीचे
रोज बाहर आने को आतुर है वो शहर और वो लोग
अकेले में इनकी खुदाई होती है कभी कभी
हर बार कुछ न कुछ मिलता है गायब वहां पर
डर लगता धीरे धीरे पूरी सभ्यता जीवाश्म न बन जाये
फिर मांगने पड़ेगा ये सब वहां से,
जहाँ जहाँ भी उम्मीद है इनके मिलने की
बस रहे है नित नए शहर इन पर, इसीलिए तो
बड़ा मुश्किल है कुछ ख़ास सभ्यताओ को बचाना
पर कहते है कि जीवाश्म से ईंधन बनता है
नयी पीढ़ी के कुछ कम आयेंगे ये मेरे शहर
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