विचार, रोटी,
प्यार, पानी और एक नशा
क्या क्या जरुरी है ?
जीने के लिए, मरने के लिए
दिनों- दिन , जिंदगी भर के लिए..
मैं, वो और हम सब...वो यानि
मिल में काम करता मजदूर...
और उसी मिल का मालिक
व्यस्त है इसी भागम भाग में
इसी जदो जेहद में....कि कुछ और मिल जाये
जो नहीं है अभी, या जो होना चाहिए
और हो केवल मेरे पास...एक्सक्लूसिवली (न्यूज़ चेनलो की तरह)
इसी तरह हम सबकी....
भूख मिटती नहीं सिर्फ रोटी से
और प्यास बुझती नहीं सिर्फ पानी से
क्योंकि हम सबको हवस है
कुछ अतिरिक्त पाने की,
ज्यादा जीने और
कम से कम मरने की...
भले ही दुसरे के हिस्से को लूट ले
शायद इसी को नए ज़माने में केपित्लिस्म कहते है (survival of fittest)
केपित्लिस्म विचारो का,रोटी का,धरम,प्यार और पानी का भी...
बाकि बचा नशा,उसपे एक समय में एक ही इज्म लगता है
क्योंकि वो कुछ और झेलने की हालत में नहीं है
मस्त है मलंग है अपने में...अलग अलग नामो से
कभी सुफिज्म तो कभी कम्युनिज्म या सोसिलिज्म...
नोट-नशे की परिभाषा में कुछ मतभेद की गुन्जायिश है और नयी परिभाषा गढ़ने के लिए
Narcotics Dept,Govt of India से अभी अनुमति लेना बाकी है!
2 टिप्पणियां:
Oh My God, this is just awesome!
Mujhe meri aukaat yaad dila di aapne :)
Patanahi kiske piche bhaag rahi hu, ziindgi bhaagte bhaagte kaha nikal jayegi, pata bhi nahi chalne vaala.
Bhaagte bhaagte, samay ko piche chodne ki koshish me na jane khud ko kaha chod aayi hu!
Awesome!!
:)
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