कहता था मेरा एक दोस्त ...
जो मेरा वो तेरा, पर मालूम है मुझे
जो तेरा वो मेरा नहीं हो सकता
है इतनी सी...... ये बात पूरी
पूरी भी और अधूरी भी....पूरी कम अधूरी ज्यादा
बड़ी भी और कभी छोटी और मामूली भी
पर दिखती जितनी, उतनी छोटी है
शायद नहीं है,
कन्फ्यूजन है थोडा इसमें
अनजान...अनभिज्ञ...
यानि स्यूडो संवेदी है हम सब
शायद नहीं है,
कन्फ्यूजन है थोडा इसमें
अनजान...अनभिज्ञ...
यानि स्यूडो संवेदी है हम सब
देख के कहता था मेरा एक दोस्त.....
ऐसे लोग होते है नए ज़माने के सूफी....
बिना बुल्लेह और बाबा फरीद के
बात करते है.... कबीर ते बाबे नानक दी
पर जीते है अपनी क्न्वीनिएन्स से...
और बहाते चलते है अपने सूफी ज्ञान की गंगा
चाहे कोई डूबे या तरे...
और फिर एक दिन सुंदरबन पहुँच जाते है
जहाँ पेड़ की जडो को भी....
जमीन से बाहर आके सांस लेना पड़ता है
पर जीते है अपनी क्न्वीनिएन्स से...
और बहाते चलते है अपने सूफी ज्ञान की गंगा
चाहे कोई डूबे या तरे...
और फिर एक दिन सुंदरबन पहुँच जाते है
जहाँ पेड़ की जडो को भी....
जमीन से बाहर आके सांस लेना पड़ता है