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रविवार, 19 जून 2011

सुंदरबन


कहता था मेरा एक दोस्त ...
जो मेरा वो तेरा,  पर मालूम है मुझे 
जो तेरा वो मेरा नहीं हो सकता  
है इतनी सी...... ये बात पूरी
 पूरी भी और अधूरी भी....पूरी कम अधूरी ज्यादा 
बड़ी भी और कभी छोटी और मामूली भी    
पर दिखती जितनी, उतनी छोटी है
शायद नहीं है,
 कन्फ्यूजन  है थोडा इसमें 
अनजान...अनभिज्ञ...
यानि स्यूडो संवेदी है हम सब      
देख के कहता था मेरा एक दोस्त..... 
ऐसे लोग होते है नए ज़माने के सूफी....
बिना बुल्लेह और बाबा फरीद के
बात करते है.... कबीर ते बाबे नानक दी
पर जीते है अपनी क्न्वीनिएन्स  से...
और बहाते चलते है अपने सूफी ज्ञान की गंगा
चाहे कोई डूबे या तरे...
और फिर एक दिन सुंदरबन पहुँच जाते है
जहाँ पेड़ की जडो को भी....
जमीन से बाहर आके सांस लेना पड़ता है










  
  

सोमवार, 13 जून 2011

island

 मन में है कई सारे टापू 
कुछ हरे भरे, और कुछ सूखे (मौसम के हिसाब से)
पर सारे एक से एक प्यारे सुंदर और रमणीय....जैसे की  इन्द्रलोक में हो  
और मैं इनपे कूदता फंदता रहता हूँ 
कभी इस टापू पे तो कभी उस टापू पर
सब में कुछ ना कुछ खास है ना 
बिना ये जाने की कौन मेरा है , और कौन पराया 
अरे पराया क्यों ? ये तो गलत बात है क्योंकि 
अब  तो ये सभी अपने है, आजकल दुनिया ग्लोबल विलेज है ना? 
इसलिए ये मेरे अपने प्रतिबिम्ब और मेरे अपने प्रतिरूप है  
 सागर के उन  बेटो की तरह.....
जो हमेशा रहेंगे भले ही कुछ भी हो जाये...
अपनी असीम गहराई और उथलेपन  के साथ 
भले ही डायनोसोर मरे या जिन्दा रहे.... 
और उन पर जुरासिक पार्के बनती रहे....
 पर आजकल खतरा एक नया पनप गया है 
हाँ सही समझे आप...... ग्लोबल वार्मिंग की बात कर रहा हूँ 
 जिससे कुछ टापू डूब रहे है, या सागर में समाने को है तैयार 
लोग कहते ये तेरे ये देश या टापू भी डूब जायेंगे 
बंगलादेश और मालदीव की तरह 
और तू क्या कर लेगा ?
 इस सबके बावजूद.... 
पर मैं जब कभी भी जाता हूँ इन टापुओ पर 
तो जीवन की एक नयी तरंग पैदा होती है 
परावर्तन और अपवर्तन के इफेक्ट के साथ....  
 क्योंकि मैं नहीं हूँ  दोषी, इस ग्लोबल वार्मिंग का 
पूछो उनसे जा के, जिनके कारण दुनिया आज गरमी खा रही है  
और जो करते थे, और आज भी करते है बाते दुनिया बचाने  की 
पर अंदरखाने शामिल थे, (और है) इस टापू भरी  दुनिया को डुबोने में
पर इतना बता देता हूँ उन सबको 
मैं नहीं डूबने दूंगा मेरे इन प्यारे टापुओ को 
क्योंकि मैं तो एक द्वीप प्रदेश हूँ  ना
और रूप बदल बदल के वही रहूँगा, यहाँ नहीं तो कहीं और 
चाहे रहू हिंद महासागर में प्रशांत में....
क्योंकि गहराई दोनों की एक समान है 
इसलिए कोई भले ही कुछ भी कहे.....मेरी बला से! 





शुक्रवार, 3 जून 2011

Everest

अपने अपने एवरेस्ट 

सुना है कि एक आदमी, नेपाल  का
पच्चीस बार एवरेस्ट पर चढ़ा है 
अरे भाई छोटे कद वाले परन्तु मजबूत इरादों वाले लोग है 
चढ़ सकते है कहीं भी, और किसी पर भी, एवरेस्ट क्या चीज है 
उसकी देखा देखी हम सब 
 मैं भी, तुम भी और ये पास में बैठी लडकी भी 
है ऊपर या नीचे परन्तु फिर भी  कोशिश  में लगे है 
क्योंकि सबका अपना अलग अलग एवरेस्ट है 
हर घर, गली-मोहल्ले और मन में है मौजूद 
 रोज चढ़ते है, और चढ़ते चढ़ते फिर गिर पड़ते है, 
गिरते ज्यादा है 
फिसलन  ज्यादा है ना शेयर मार्केट में आजकल 
इसी चढ़ावत गिरावट में शामिल हूँ 
मैं भी, तुम भी और ये पास में बैठी लडकी भी 
लडकी तो थोड़ी नादाँ और मासूम लगती है 
पर होशियार है बहुत, शेयर मार्केट की नोलेज है उसको 
और हम तो जानते ही एक दुसरे को क्या बताऊ मैं 
बरसो से साथ में है इस मिशन पर 
पर इन असफल कोशिशो के बावजूद उम्मीद है कि 
एक दिन तो पहुंचेंगे एवेरेस्ट के उस पर पार जन्नत या नरक में 
मै भी, तुम भी और ये पास में बैठी लडकी भी  
जहाँ कोई दुःख, कोई गम और मैं, तुम, ये लड़की कोई नहीं होगा
 क्योंकि जन्नत या नरक जो भी होगी, अपनी अलग अलग होगी ना 
और  हमें अपने अपने हिस्से का मोक्ष मिल जायेगा
 पता नहीं क्या मिलेगा, हमें क्या पता 
एक बार नेपाल के सुपर शेरपा  से पूछ ले क्या?
वो तो अनुभवी है ना.....