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रविवार, 1 मई 2011

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नए युग के संत 

हमारे देश और  समाज में एक जमाना था (पता नहीं हम तो  थे नहीं उसमे पर, किताबो में पढ़ा है और लोगों से सुना है) कि समाज और समुदायों में कुछ लोग ऐसे होते थे जिनकी बातों को लोग गंभीरता से सुनते थे या जिनकी बातों पर विश्वास करते थे या कहे कि ये लोग उस ज़माने के मार्गदर्शक या आज कि भाषा में ओपीनीयाँ मेकर होते थे या देश,समाज के लिए उदहारण प्रस्तुत करते थे और अपने कार्य कलापों और चरित्र में इनको धारण करते थे  इसीलिए  आज हम उन लोगो कि जीवनिया पढ़ते है और उनसे सीखते है एक आदर्श समाज के निर्माण के लिए किन किन बातों कि आवश्यकता होती है 

परन्तु आज के देशज समाज काल  में इस सबका एकदम उल्टा होता जा रहा है  नए युग के ये तथाकथित संत दुनिया को वे सारी बाते कहते है जिनका उनके स्वयं से दूर दूर तक कोई नाता नहीं होता हालाँकि दिखाने  कि पूरी कोशिश करते है वे ही इस देश और समाज के  सबसे बड़े विचारक, समाज सुधारक या फिर वाच ड़ोग ऑफ़ सोसाइटी, या फोर्थ पिल्लर ऑफ़ डेमोक्रेसी है! पर हकीकत इससे कोसों दूर कहीं राजस्थान के थार रेगिस्तान में पानी मांग रही होती है! जी हाँ मैं बात कर रहा हु आज के तथाकथित मीडिया मुगलों और बड़े सेलेब्रटी पत्रकारों की जिनसे समाज को बड़ी उमीदे थी पर आज की तारीख में ये सभी स्वयं भू न्यू एज संत पूरी तरह से नंगे हो गए है खास तोर पे नीरा मैडम के कांड के बाद तो ये मीडिया और राडिया में विभक्त हो गए है! सुनते है कि  बड़ी बड़ी सुनहरी इमारते  रातो रात भरभराकर गिर गयी है! और ये ही वाच ड़ोग अब लेप ड़ोग ऑफ़ कॉरपोरेट बन गया है!

बरखा दत्त,वीर संघवी,प्रभु चावला, राजदीप सरदेसाई, एम्  वेणु..... और जाने कौन कौन शामिल थे और अभी भी अंदरखाने शामिल है,एक जमाना था तब (ज्यादा पुरानी बात नहीं है ) ये सभी लोग देश के मीडिया छात्रो के लिए आदर्श बने हुए थे पर आज खुद एक आदर्श सोसायटी  घोटाला बन चुके है! हालत ये हो गयी की बरखा  दत्त को इंडिया गेट से छात्रो और आम जनता के विरोध के कारण शो (वो भी भ्रस्ताचार के खिलाफ ) किये बिना वापस भागना पड़ा! और स्मार्ट, बहकी हुई आँखों वाले देश के सबसे काम उम्र के संपादक रह चुके  वीर के तीर अब पता नहीं अब किस बार, होटल या रेस्टोरेंट में जलवा दिखा रहे है, अपने प्रभु जी की माया तो और भी निराली है अब इंडिया टुडे में  सीधी बात करने के बाद अब ई टीवी और इंडियन एक्सप्रेस में सच्ची बात करने चले गए है! और मजे की बात यह है की  ये लोग भ्रस्ताचार के खिलाफ बात करते है! वाह रे देश के एलिट पत्रकारों धन्य है आप हालाँकि आरोप लगने से कोई अपराधी साबित नहीं हो जब  परन्तु मीडिया तो पूरा ही क्रेद्दीब्लिटी या साख पर ही चलता है और उसके तो परखाछे उडा दिए गए है!

देश के हर मीडिया हाउस में अब लक्ष्मी  और सरस्वती का संतुलन गड़बड़ हो  गया है, मीडिया के छात्रो के लिए आदर्शो की कमी पड़ती जा रही है! कभी कभी तो ऐसा लगता है क्या हमे ऐसे बड़े मीडिया होउसेज  की जरुरत है जिनके अपने स्वार्थ सच्ची पत्रकारिता पर भारी पड़ रहे है! आज भी बड़ी से बड़ी स्टोरी छोटे छोटे पत्रकार और मीडिया संसथान ही ब्रेक करते जिसको बड़े सेलेब्रटी पत्रकार अपनी सहूलियत से हाईजैक कर लेते है! इसीलिए तो ऐसी बात नहीं है की देश में अच्छे पत्रकार है ही नहीं, परन्तु बात यह है कि उन संस्थानों में में उनकी बात कितनी  सुनी जा रही है ये भी एक क्रिटिकल बात है और इसीलिए न्यू मीडिया या अल्तार्नातिवे मीडिया जनम ले रहा है और खूब फल फुल रहा है अब तो हर आदमी पुब्लिशेर  है या ब्रोडकास्टर है!  मीडिया संस्थानों कि साख दिनों दिन गिरती जा रही है  फिर भीं भारत एक  विरोधाभासों  वाला देश है और यहाँ डेली एक मीडिया चैनल खुल रहा है या फिर मीडिया स्कूल खुल रहे है! सारे बड़े बड़े पत्रकार इसी मीडिया को खूब गरियाते है या सेमिनारो में इसके खिलाफ आग  भभकते है परन्तु शाम होते होते प्रेस क्लुबो के सुरूर और महंगाई भारी दुनिया में ये सारे आदर्श सुबह कि ड्यूटी के लिए ध्वस्त हो जाते है! और ये नए युग के संत अपनी अपनी श्रध्हा और क्षमता के हिसाब से प्रवचन और पूजा करने चल पड़ते है गोया कि देश और समाज को सही राह दिखाने का ठेका  जो इन्होने ले  रखा है! टेंडर भी खुद ही छापते हा और बिडिंग भी खुद  ही तय  करते है!

मुझे  लगता है कि अमेरिका के  सैनिक और इंडिया में जर्नलिस्म के नए नए  छात्र को ये मुगालता होता  है कि वो दुनिया कि बेहतरी और बदलाव  के लिए काम कर रहा है पर असलियत " रामगोपाल वर्मा कि शोले" जैसी होती है! हालाँकि रामगोपाल वर्मा में ये  दम है कि वो किसी भी दिन "सत्या" वाली वापसी कर सकते है!





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