बंगाल और लेफ्ट
कहते है की कार्ल मार्क्स ने एक किताब लिखी- "दास केपिटल" और पूरी दुनिया को दो भागो में बाँट दिया एक तो वो जो इन विचारो से सहमती रखते है और दुसरे वो जो इसके खिलाफ है! परन्तु शीत युद्ध और सोवियत संघ के बिखराव से होते हुए येही वामपंथी विचार अब धीरे धीरे दुनिया के नक्शे से सिमटते जा रहे है और दुनिया के कुछ एक देशो में ही लाल झंडा फहराता नजर आ रहा है इन जगहों में पिछले कई दशको से भारत का बंगाल, केरल और त्रिपुरा राज्य भी रहे है हालाँकि केरल में तो फिर सत्ता बदलती रही है परन्तु बंगाल में पिछले तीन दशको से सीपीम की सरकार रही जो देश के राजनीतिक इतिहास का एक रिकॉर्ड है परन्तु इस बार हो रहे विधानसभा चुनावो पर पूरी दुनिया की नज़र है ( विकिलीक्स के केबल्स से साबित होता है) ऐसा इसीलिए क्योंकि इस बार उम्मीद की जा रही है ममता, माओवादी, और कोंग्रेस सब मिलकर सीपीम की मोनोपोली को ख़त्म कर देंगे! जाने माने पत्रकार एम् जे अकबर ने लिखा है की भारत में माओवाद का सबसे पहला शिकार सीपीम ही होगी! यानि की नंदीग्राम और सिंगुर की घटनाओ के बाद जो जमीन की लड़ाई में माओवाद और तृणमूल का गठबंधन दिखा है उससे ये साबित हो गया है पिछले तीन दशको में पहली बार ऐसा हो रहा है की ग्रामीण बंगाल में सीपीम के काडर के सामने खड़े होने की कोई हिम्मत कर रहा है!
पर ऐसा क्यों है की माओवाद जो स्वय में एक एक्सट्रीम कम्युनिस्म है वो लिबरल कम्युनिस्म यानि की सीपीम को उखाड़ने पर तुला हुआ है क्योकि मओवादियो की जो पहली मांग है लेण्ड रिफोर्म, और वो कार्य देश के किसी राज्य में हुआ है तो वो बंगाल की की ज्योति बासु सरकार ने ही किया है! पर जो उम्मीद इन वामपंथीयो से उनके साथी कोमरेडो को थी उस पर शायद वो खरे नही उतरे है और वो ही गुस्सा इस रूप में आ रहा है! इन सब विरोधभासो के बावजूद तृणमूल और देश पोपुलर मीडिया को लगता है की इस बार लाल किला ढह जायेगा और बंगाल में पोरिबर्तन होगा क्योंकि बंगाल की युवा पीढ़ी ने अभी तक अभी तक अपनी जिंदगी में एक ही सरकार देखी है! मेरे हर बंगाली दोस्त से जब भी पूछता हु तो वो सीपीम को ही बंगाल की दुर्गति का कारण मानते है और उनका गुस्सा इनके खिलाफ फुट पड़ता है! (कोलकत्ता में जब पहला मेक्डोनाल्ड का ढाबा खुला था तो वो भी एक खबर बनी थी)
परिवर्तन तो पृकृति का नियम है और होना ही चाहिए क्योंकि कहते है पानी बहता हुआ ही अच्छा लगता है एक जगह पर रुका हुआ पानी सड़ जाता है भले ही वो कितना पवित्र क्यों न हो! सीपीम ने बंगाल में इतने साल शासन किया तो इसका एक मुख्य कारण माना जाता है इसके लोकल लेवल काडर की क्षमता और अनुशासन! हालाँकि इसी काडर पर आज हिंसा,भ्रस्ताचार और भाई भतीजावाद में लिप्त होने के आरोप है साथ ही बंगलादेशी घुसपेठियो को काडर में शामिल करने और ग्रामीण बंगाल में हिन्दू वोटरों को अल्पसख्यंक बना देने के आरोप भी है! और ये बात तो वामपंथी नेता भी मानते है की जिस काडर पर सीपीम को गर्व था आज उसी के कारण बंगाल में उनकी हालत नाजुक है और इन्ही हालातो का पूरा फायदा उठा रही है ममता बेनर्जी और उनकी तृणमूल कोंग्रेस!
इन चुनावो में एक जो बात देखने वाली है की सभी ने ये मान लिया है की बंगाल में लेफ्ट मोर्च हारने वाला है और इसीलिये बड़े बड़े रिटायर्ड अफसर और बिजेस्मेन तृणमूल के टिकट पर चुनाव लड़ रहे है जो अभी तक लेफ्ट की शरण में थे, क्योंकि जहाज के डूबने से पहले चूहे अपनी जगह बदलना जो चाहते है! साथ ही बड़े बड़े कोर्पोरेट होउसेस जिनको अभी तक बंगाल में ज्यादा कुछ करने को नही मिलता था अब उन्हें उम्मीद है की ममता सरकार आने के बाद राज्य में इंडस्ट्री के लिए माहोल बनेगा और उस बहती गंगा में हम सब हाथ धोयेंगे क्योकि 1991 से देश में लागु हुए ग्लोबलाय्यिजेस्न के बावजूद बंगाल इस सब से कुछ हद तक अछूता ही रहा है, बीच में बुद्धदेब सरकार ने नेनो के मार्फ़त इसे लाने की कोशिस की तो टाटा को विकास पुरुष मोदी जी के गुजरात में जाना पड़ा! वैसे ये भी बात है जब पूरा देश मनमोहन जी की हार्डकोर आर्थिक नीतिया अपना रहा है तो उसी देश में आप अपनी सरकार वामपंथी विचारो से कैसे चला सकते है! समझोता तो करना ही पड़ेगा और फिर बंगाल के सोशिअल इंडिकेटर भी तो ठीक नही है शिक्षा, स्वास्थय,रोजगार जैसे हर मुद्दे पर बंगाल की हालत कोई अच्छी नही कही जा सकती! परन्तु ममता के लिए भी बंगाल को इतनी आसानी से पटरी पर लाना इतना आसान नही होगा क्योकि जिन जमीन और इंडस्ट्री के मुद्दों के कारण सीपीम सत्ता से बाहर होने के कगार पे है उन पर सीपीम भी ममता को आसानी नहीं छोड़ने वाली है क्योंकि बंगाल में जमीन एक भावुक करने वाला मुद्दा है है आज का हर उद्योग जल,जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पे ही टिका है! और तब ये भी देखने लायक होगा की तृणमूल और माओवादी का आपसी व्यवहार कैसा होगा! और माओवादी ममता सरकार पर क्या कहते है! पर क्या इस चुनाव के बाद देश में वामपंथीयो की प्रासंगिकता खत्म हो जाएगी, ये तो अभी भविष्य के गर्भ में है पर इतना तय है की लेफ्ट पार्टीयो को अब गहन चिंतन मनन करना होगा और वक़्त के साथ अपनी राजनीतिक सोच और विचार में भी बदलाव करने होगे ( बदलाव कास्त्रो के क्यूबा में भी शुरू हो गये है) और अपनी राजनीती को जेनयू की बोद्धिक जुगाली से बाहर लाना होगा!
क्योकि देश के गरीब,मजदुर,किसान और शोषित वर्ग को हार्डकोर पूंजीपति क्लास के भरोसे छोड़ना भी मोनोपोली बढ़ाना ही होगा! देश की मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी की जो हालत है उनसे तो एक सशक्त विपक्ष की उम्मीद करना बेमानी होगा! और इसीलिये लेफ्ट पार्टियों की इस देश की राजनीती को सख्त जरूरत है क्योकि लेफ्ट पार्टीया यूपीए सरकार में रहते हुए भी मनमोहन के लिए इतना बड़ा सरदर्द बने हुए थे जितना बीजेपी आज के भ्रटाचार माहोल में नही बन पा रही है!
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