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शनिवार, 10 दिसंबर 2011

तुम एक गोरखधंधा हो...


Poet-Naaz khialaavi
Sung by-Ustad Nusrat Fateh Ali Khan

हो भी नहीं और हर जहाँ हो
तुम एक गोरखधंधा हो
हर जर्रे में किस शान से तू जलवानुमा है
हैरान है अक्ल की,  तू कैसा है और क्या है
तुझे गेरो हरम में मैंने  ढूँढा तू नहीं मिलता
मगर तशरीफ़ फरमा, तुझको अपने दिल में देखा है
 तुम एक गोरखधंधा हो

हरमो गैर में है जलवा ए पुर्फन तेरा
दो घरो का है चराग, एक रूखे रोशन तेरा
जब बाजुस तेरे दूसरा कोई मोजूद नहीं
फिर समझ में नहीं आता तेरा पर्दा करना
 तुम एक गोरखधंधा हो

जो उल्फत में तुम्हारी खो गया है
उसी खोये हुए को कुछ मिला है
न बुतखाने न काबे में मिला है
मगर टूटे हुए दिल में मिला है
अदम  बन कर कही छुप गया है
कहीं तू हस्त बन के आ गया है
नहीं है तू तो फिर इंकार कैसा
नाफीबी तेरे होने का पता है
जिसको कह रहा हूँ अपनी हस्ती
अगर वो तू नहीं तो और क्या है
नहीं आया ख्यालो में अगर तू
तो फिर मैं कैसे समझा तू खुदा है
तुम एक गोरखधंधा हो

हैरान हूँ इस बात पे तुम कौन हो क्या हो
हाथ आओ तो बुत हाथ ना आओ तो खुदा हो
अक्ल में जो गिर गया न इन्तहा क्यों कर हुआ
जो समझ में आ गया फिर वो क्यों कर खुदा हुआ
फ़लसफ़ी को बहस के अंदर खुदा मिलता नहीं
डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं
मिलते नहीं हो, सामने आते नहीं हो तुम
जलवा दिखा के, जलवा दिखाते नहीं हो तुम
गैरो हरम के झगडे मिटाते नहीं हो, तुम
जो असल बात है वो बताते नहीं हो, तुम
हैरान हूँ मेरे दिल में समाये हो किस तरह
हालाँकि दो जहाँ में समाते नहीं हो, तुम
ये महा बदो हरम ये खलिसा ओ देर क्यों
हरजाई हो, तभी तो बताते नहीं हो तुम
तुम एक गोरखधंधा हो

दिल पे हैरत ने अजब रंग जमा रखा है
एक उलझी हुई तस्वीर बना रखा है
कुछ समझ में नहीं आता की, ये चक्कर क्या है
खेल तुमने क्या अजल से ये रचा रखा है
रूह को जिस्म के पिंजरे का बना के कैदी
उसपे फिर मौत का पहरा भी बिठा रखा है
देके तदबीर के पंछी को उड़ाने तुमने
नामे तकदीर भी हर शब्द बिछा रखा है
करके आरैसे दो नयन के बरसो तुमने
ख़त्म करने का भी मंसूबा बना रखा है
ला मकानी का बहरहाल है दावा है तुम्हे
नह्लो अकरब का भी पैगाम सुना रखा है
ये बुरे वो भलाई ये जहन्नम वो बहिस्त
इस उलट फेर में फरमाओ तो क्या रखा है
जुर्म आदम ने किया और सजा बेटो को
बदले ओ इन्साफ का मियार भी क्या  रखा है
देके इंसान को दुनिया में खलाफत अपनी
एक तमाशा सा ज़माने में बना रखा है
अपनी पहचान की खातिर बनाया सबको
सबकी नज़रों से मगर खुद को छुपा रखा  है
 तुम एक गोरखधंधा हो

नित नए नक्श बना देते हो, मिटा देते हो
जाने किस जुर्म ए तमन्ना की सजा देते हो
कभी कंकड़ को बना देते हो हीरे की कली
कभी हीरो को भी मिट्टी में मिला देते हो
जिंदगी कितने ही मुर्दों को अत्ता की जिसने
वो मसीहा ही सलीबो पे सजा देते हो
खवाहिशे दीद कर बैठे सरे तुर कोई
खुद ही बर्के तजली से जला देते हो
नारे नमरूद में जलवाते हो खुद अपना खलील
खुद ही फिर नार को गुलज़ार बना देते हो
  तुम एक गोरखधंधा हो

About Poet: Naaz Khiaalvi

Real Name Muhammad Siddique, Takhalus Naaz and known as Naz Khialvi due to reason that he belongs to a village named as "Khiaali". Khiaali is about 5 Km away from Tandlianwala which is tehsil of Distric Faisalabad. Tandlianwala is 60 miles aways from Faisalabad.
Naaz Khialvi is doing Urdu and Punjaabi poetry since last 30 years (aprox). As he bolongs to a remote area, therefore he got less chances to come in lime light. His only source of income is a punjabi radio program "sandhal Dharti" which he is hosting since many years. The program is being broadcasted from Radio Faisalabad. Naaz sahib is of 55 years age (aprox) but he is still unmarried. His poetry has reached the level of "miraaaj" but the media is in control.
"Tum Ik Gorakh Dhanda hoo" was just a routine poetry for Naaz shaib, but became special due to Nusrat Fateh Ali Khan. Nusrat sahib belongs to Faisalabad and he had relations with radio people also. Somebody told him about Naaz sahib and he met Naaz sahib and requested personaly to write a qavaali for him. Naaz sahib did it for very little amount of money for Nusrat . How much revenue this qavali has earned? No body knows, it was a record breaking selling album. Same way Ata Ullah Niazi sung two cassettes comprising poetry of Naaz shaib. Both the cassettes were super hit. Naaz sahib asked Niazi that why he sung his poetry without his permission. In reply Niazi gave about 4000 rupees to Naaz sahib and he was more than happy.

Song link-http://www.youtube.com/watch?v=ZtiRNHGbOGg

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