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सोमवार, 13 जून 2011

island

 मन में है कई सारे टापू 
कुछ हरे भरे, और कुछ सूखे (मौसम के हिसाब से)
पर सारे एक से एक प्यारे सुंदर और रमणीय....जैसे की  इन्द्रलोक में हो  
और मैं इनपे कूदता फंदता रहता हूँ 
कभी इस टापू पे तो कभी उस टापू पर
सब में कुछ ना कुछ खास है ना 
बिना ये जाने की कौन मेरा है , और कौन पराया 
अरे पराया क्यों ? ये तो गलत बात है क्योंकि 
अब  तो ये सभी अपने है, आजकल दुनिया ग्लोबल विलेज है ना? 
इसलिए ये मेरे अपने प्रतिबिम्ब और मेरे अपने प्रतिरूप है  
 सागर के उन  बेटो की तरह.....
जो हमेशा रहेंगे भले ही कुछ भी हो जाये...
अपनी असीम गहराई और उथलेपन  के साथ 
भले ही डायनोसोर मरे या जिन्दा रहे.... 
और उन पर जुरासिक पार्के बनती रहे....
 पर आजकल खतरा एक नया पनप गया है 
हाँ सही समझे आप...... ग्लोबल वार्मिंग की बात कर रहा हूँ 
 जिससे कुछ टापू डूब रहे है, या सागर में समाने को है तैयार 
लोग कहते ये तेरे ये देश या टापू भी डूब जायेंगे 
बंगलादेश और मालदीव की तरह 
और तू क्या कर लेगा ?
 इस सबके बावजूद.... 
पर मैं जब कभी भी जाता हूँ इन टापुओ पर 
तो जीवन की एक नयी तरंग पैदा होती है 
परावर्तन और अपवर्तन के इफेक्ट के साथ....  
 क्योंकि मैं नहीं हूँ  दोषी, इस ग्लोबल वार्मिंग का 
पूछो उनसे जा के, जिनके कारण दुनिया आज गरमी खा रही है  
और जो करते थे, और आज भी करते है बाते दुनिया बचाने  की 
पर अंदरखाने शामिल थे, (और है) इस टापू भरी  दुनिया को डुबोने में
पर इतना बता देता हूँ उन सबको 
मैं नहीं डूबने दूंगा मेरे इन प्यारे टापुओ को 
क्योंकि मैं तो एक द्वीप प्रदेश हूँ  ना
और रूप बदल बदल के वही रहूँगा, यहाँ नहीं तो कहीं और 
चाहे रहू हिंद महासागर में प्रशांत में....
क्योंकि गहराई दोनों की एक समान है 
इसलिए कोई भले ही कुछ भी कहे.....मेरी बला से! 





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