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रविवार, 28 अगस्त 2011

बातों का बन्तुलिया

लोग कहते है की, बड़ा अजीब सा है ये 
पर मैं तो खुद अपने जैसा ही  नहीं 
ऐसा भी नहीं, और वैसा भी नहीं
 फिर क्या उनको बताऊ मैं....
 क्या  था मैं? और क्या रह गया?
उन सबके ख्यालो और विचारों में
एक धुंधले से कन्फ्यूज विचार के तौर पे 
जो रेगिस्तान पर मंडराते बादल की तरह 
बेमतलब बेमियादी उडान भरता रहता है 
जबकि वो सभी, हाँ हाँ वो सभी लोग
निकल आये है समय की उस बस्ती से
जहाँ कुछ फूल  उगे थे, कुछ कलियाँ खिली थी 
मुरझाने के लिए, और बेमौत मर जाने के लिए
शायद पानी वहां का खारा था या मिट्टी माकूल न थी
क्या पता उनकी यही नियति थी या कुछ और परिणिती 
पर लोग कहते है खाम-खा का रोमान्तिसयिज मत करो यार 
क्योंकि तुम अभी भी मिट्टी का मन लेके घूमते हो 
और मन मुताबिक कलि या फुल उगाते रहते हो
पर ऐसा कुछ रियल जिन्दगी में होता नहीं है
शायद सच ही कहते है लोग.... 
और लोग कहते भी बहुत है 
या मैं लोगो की सुनता बहुत हूँ
कुछ तो बात है, बातों के इस बन्तुलिये* में 




*(बन्तुलिया )-रेत के बवंडर के लिए एक मारवाड़ी शब्द 




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