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मंगलवार, 3 मई 2011

business of image

धंधा छवि गढ़ने का 

रामगोपाल वर्मा की फिल्म "कम्पनी " में एक गाना है " गन्दा है पर धंधा है यह" जी हाँ दुनिया का सबसे क्रिएटिव  और कमाऊ धंधा है बड़े लोगो,कम्पनियो,पार्टियों और हर बिजनेस  की छवि  बनाना  और बिगाड़ना! इसको ओपीनियन,पेर्सेप्सन या इमेज मेकिंग भी कह सकते है! शुरू करते है पार्टियों से कोंग्रेस सेकुलर पार्टी है बीजेपी हिन्दू पार्टी  है, बीसपी दलितों की पार्टी है या लेफ्ट पार्टिया गरीब मजदूरो की बात करती है! ये सब इन पार्टीयो की पोपुलर छविया या इमेज है परन्तु  इमेज अपने मूल रूप में गाढ़ी नहीं जाती है बल्कि कामो और घटनाओं और समय के हिसाब से बनती है परन्तु एक बार स्थापित होने के बाद मेंटेन की जाती है या अपनी सहूलियत से घटाई, बढ़ाई या बदलने की कोशिश भी की जाती है!  जैसे की गुजरात दंगो के समय नरेंद्र मोदी हिन्दू ह्रदय सम्राट थे और आजकल विकास पुरुष है! 1984 में सिखों का कत्लेआम होता है तो कोंग्रेस कुछ और थी और उससे पहले और बाद में सेकुलर! बीजेपी के लोह्पुरुष लाल जी भाई आडवानी तो इंडिया(अयोध्या)  में कुछ और जिन्नाह की कब्र पर कुछ और हो जाते है! सबसे मजेदार उदहारण तो मुलायम जी की समाजवादी जमात  जो  कभी अमरवादी होती है कभी अमिताभवादी, और अपने मूल में यादव वादी तो है! वही  अपने मेगा स्टार ऑफ़ दी मिलेनियम बिग बी  को कभी यूपी में जुर्म कम लगता है तो कभी कच्छ का रण अच्छा लगता है! इसी तरह से  बंगाल  में तो  इमेज बदलने के चक्कर  में तो  अब सरकार बदलने की तैयारी हो रही है! बहन मायावती के यूपी में दलितों पर अत्याचार और बढ़ गए है कम की बात करे ही क्या! अब सवाल  उठता है फिर ये घालमेल क्यों है! और ये  सिर्फ राजनीती में ही नही है समाज के हर क्षेत्र में है यह गोरखधंधा!

 इसको कहते है प्रोडक्सन ऑफ़ पेर्सेप्सन यानि की लोगो को विचारो और इमेज में इस तरह से बाँट दो की लोग उसी चश्मे हर चीज को देखे जिस चश्मे से आप उन्हें दिखाना चाहता है!इसी इमेज मेकिंग में हजारो लाखो करोडो की कम्पनिया चल रही है कोंग्रेस गरीब के हाथ को अपने साथ बताती है या बीजेपी मजबूत नेता और निर्णायक सरकार देने का वादा करती  है! पर क्या ये सब एक जुआ नहीं लगता जिस पर पार्टिया,कम्पनिया करोडो रूपये खर्च कर देती है हर बड़ी  कम्पनी  कुछ खास हीरो हेरोइन से अपने ब्रांड का प्रचार इसलिए करवाती है क्योकि उनकी एक खास इमेज है जैसे की जॉन इब्राहीम बाईक का एड करेंगे तो सलमान खान माचो बनियान  का और करीना साइज जीरो फिगर की! पर क्या इन कम्पनियों को  अपने खर्च किये पैसे का पूरा फायदा मिलता है जैसे की  फला हीरो के एड करने से किसी खास वस्तु  बिक्री बढ़ गयी है! पर  इस बिजनेस से जुड़े लोग कहते है की  इनको चुनने और भुनाने का एक मेथड है जिस पर ब्रांड पर्मोसन करने वाले अपनी हजारो सिगरेट और सुरीली शामे नष्ट करते है  बकायदा मार्केट रिसर्च और पब्लिक सर्वे किया जाता जाता है और फिर पूरा विज्ञापन और इमेज मेकिंग केम्पेन तेयार किया जाता है ! पर क्या भारत जैसे देश में ये सब इतना आसान है या अपनी सहूलियत के लिए इतना सिंपल बना दिया गया है उदहारण के लिए टेम वालो की टीआरपी सिस्टम के कारण देश को इंडिया टीवी और यूटीवी  बिंदास जैसे मेंटल टॉर्चर झेलने पड़ रहे है 
और इसके पीछे लोजिक क्या है टीआरपी सिस्टम? वो  भी देश के कुछ हज़ार  घरो में लगे मीटर के जरिए और इसके पक्ष में  कहा जाता है की लोग येही देखना चाहते है (लोग तो ब्लू फिल्म भी देखना चाहते है)
 तब जा के इस सारे मेथड पर शक होता है की क्या हमारे देश की जनता इतनी पागल है की इंडिया टीवी नम्बर एक न्यूज़  चेनल है! और उसी पे अरबो का विज्ञापन बिजनेस इधर से उधर होता है! इसी की देखा देखी  बाकि अच्छा काम कर कर रहे चेनल भी इसी चिरकुटई की होड़ पे लग जाते है तभी बड़े बड़े क्रिएटिव एड गुरुओ,इमेज मेकर्स  की क्रियेटिविटी और इरादों पर शक होने लग जाता है और सब कुछ सतही लगने लग जाता है!

 और  ये इमेज स्वत बनने की बजाय क्रियेट की हुई लगती है और तब ये सवाल उठता है की  क्या हम कोई इससे अच्छा तरीका या मेकेनिज्म नही बना सकते जिससे इस सब में कुछ पारदर्शिता आये और धंधा इतना गन्दा न लगे और हर चीज को उसकी सही जगह और इज्ज़त मिले! न की कुछ लोगो के हाथ में ऐसी  पावर की हम किसी को बना सकते या बिगाड़ सकते है!

अंत में देश के दो सबसे बड़े मजाक-
१. इंडिया टीवी देश का नम्बर वन न्यूज़ चेनल है 
२. वीर फिल्म की पटकथा (स्क्रिप्ट) सलमान खान ने लिखी है 







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