सब कुछ सतही है
उथला उथला सा और कम गहरा
न कोई आधार और ना मूल
जैसे कोई हो अमरबेल
बढे, पले उसपे....और
शून्यता की और
बढ़ते हुए
निर्बाध गति से अंदर ही अंदर
गढ़ता हुआ इतना गहरा की
कोई देख न सके, कोई छू न सके
पर फिर भी सब सतही है
सूरज की उस रौशनी की तरह
जिसकी विराटता खुली आँखों तक ही है