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शुक्रवार, 13 मई 2011

astronomy

चाँद के पार  

तुम क्या हो ,कुछ हो भी या सिर्फ एक विचार 
जिसका होना या न होना भी इतना जरूरी 
जितना स्वयं के अस्तित्व का होना 
परन्तु जब तुम नही तो, मैं 
बिना नासा के चाँद के पार चला जाता हूँ 
और थोडा बहुत सा गुरुत्व हीन हो जाता हूँ 
क्योंकि चाँद पे विचारो का टोटा है 
वैसे भी चाँद उम्र में धरती से छोटा है 
वापस जो फिर से अपने में लोटता हूँ 
आकाश गंगा के लाखो करोड़ो तारो की तरह,ये विचार 
और इनमे ध्यान रखना, उस खास विचार का 
 बड़ा मुश्किल है मेरे लिए तो, और तुम फिर से 
ध्रुव तारे जैसे सबसे ऊपर निकल के आ जाते हो 
और तुमसे बचते बचाते मै फिर से चाँद पार पहुँच जाता हूँ 
कहानी ये आज की नही, सदियों से ऐसा होता है  
 देख के लोग कहते कि मैं तो रिजिड सा  हो गया हूँ  
क्या कहूं मैं उनको, शायद अन्तरिक्ष विज्ञानं का ज्ञान नही उन्हें 
असल में चाँद, धरती का और मै चाँद का उपग्रह हो गया हूँ 
और उसकी कक्षा में अब परमानेंट स्थपित हूँ 
और चक्कर पे चक्कर पे लगा रियां हूँ 
चाहो तो इसरो या नासा वालो से पूछलो....



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