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रविवार, 22 मई 2011

caste census

मेरी जाति तेरी जाति 

        जाति और धर्म के आधार पर जनगणना को केबिनेट ने मंजूरी दे दी है इसका मतलब ये है अब सही सही ये पता चलेगा कि(मोटे तौर पे) देश में कोनसी जाति के कितने लोग है और देश में अलग अलग धर्म  के अनुयायियों की जनसँख्या कितनी है! वैसे कई लोग इस विचार के सख्त खिलाफ है की जनगणना जाति और धर्म के आधार पर  करने समाज जाति और धर्मो में बंट जायेगा और इस बुराई  को और बढ़ावा मिलेगा! ये विचार सुनने में बड़ा ही अच्छा है या कहे पवित्र है परन्तु इसका देश की  जमीनी सच्चाई से इसका  कोई लेना देना नहीं है! क्योंकि हमारा समाज सदियों से जाति और धर्मो पर बंटा हुआ है देश के बहुसंख्यक हिन्दू धर्म की पूरी व्यवस्था ही जाति आधारित है!
ब्राह्मण, क्षत्रिय.वैश्य और शुद्र, ये चार शब्द तो पुरे हिन्दू धर्म को पूरा क्लासिफाई करते है! देश के दुसरे अल्पसंख्यक धर्मों जैसे कि इस्लाम,ईसाई और सिख धर्म  इस बुराई से अपने को दूर बताते है परन्तु जाति इन धर्मो में किसी न किसी रूप में स्थापित है! हिन्दू धर्म से ईसाई बने आदिवासियों के साथ भी बराबरी का व्यवहार  नहीं होने की खबरे देर सवेर आती रहती है और इन लोगो की हालत तो त्रिशंकु जैसी हो जाती है क्योंकि धर्मान्तरित ईसायियो के साथ चर्चो में सौतेला व्यवहार होता है! ओड़िसा,केरला और नोर्थ इस्ट के राज्यों में अंदरखाने ये धर्म युद्ध तो ईसाई और हिन्दू संस्थाओ के बीच कई सालो से चल रहा है इन सबके मूल कारण में हिन्दू धर्म की जाति व्यवस्था है क्योंकि तथाकथित  निचली जातियों या दलितों के साथ बराबरी का व्यव्हार नहीं होता है इसी का फायदा दुसरे धर्म उठाते है और बड़े पैमाने पर धर्मान्तरण होता है! और फिर पुनः धर्मान्तरण  होता है! और ये खेल जारी है ! यहाँ तक कि बाबा नानक के सिख धर्म और पंजाब को भी गुरुद्वारों की राजनीती ने  विभिन्न डेरों और पन्थो  का घर बना दिया है जिसमे राधा स्वामी,बाबा राम रहीम ,निरंकारी  और रैदासी प्रमुख है  इन सबके जड़ में भी ये जाति ही है क्योंकि ऊंची जाति के जाट सिख गुरुद्वारों और अकाली आन्दोलन पर हावी हो गये है जिससे दुसरे सिखों ने अपने अपने नये डेरे और सेक्ट बना लिए है और इनमे आपस में संघर्ष चलता रहता है! इस्लाम में भी  ही ये ही ब्राह्मणी सोच  मुल्लाह मौलवियों ने अपना ली है यहाँ तक कि कुछ मुस्लिम जातिया  तो ओबीसी में शामिल है और आरक्षण का फायदा भी ले रही है! 

             इस देश का हर चुनाव् भले वो पंचायत  का हो  या लोकसभा का सभी जातीय समीकरणों पर लड़े जाते है यहाँ तक की अब तो अलग अलग जातियों और धर्मो की आकांक्षाये पूरी करने वाली पार्टिया अस्तित्व आ चुकी है और खुले तौर पर जाति या धर्म  विशेष की राजनीती करती है जिसमे बीसपी हो या केरल मुस्लिम लीग या लालू की राजद सभी शामिल है! ये तो सिर्फ उदहारण है इनकी लिस्ट बहुत लम्बी है! पर मजे की बात ये है की अगर कांग्रेस और बीजेपी जाति  के आधार पर उम्मीदवारों का चयन करती है तो इसे कहा जाता है इन पार्टियों ने उमीद्वारो के चयन में  सभी जातियों का ध्यान रखा है और अगर ये काम बीसपी या कोई क्षेत्रीय पार्टी करे तो उस  पर जातिगत राजनीति करने का आरोप लगाया जाता रहा है हालंकि अब तो मायावती भी सर्वजनो की बात करने लगी है! क्योंकि सिर्फ दलितों के वोट से यूपी पर शासन नहीं किया जा सकता है!

इस देश में आप जाति से कैसे इंकार कर सकते है क्योंकि जन्म से मृत्यु तक के हर काम में इसकी कदम कदम  पर  जरुरत पड़ती  है! यहाँ तक कि  सरकार की हर कल्याणकारी   योजना भले ही वो मनारेगा हो या राष्ट्रीय ग्रामीण स्वाश्थ्य मिशन हो सभी की कार्य योजना जाति और धर्म के आंकड़ो पर ही टिकी होती है इसीलिए इसकी प्रासंगिकता और बढ़ जाती है  देश के बड़े बड़े सेलेब्रिटीज ने  कहा है कि वो लोग तो अपनी जाति इंसानियत लिखवायेंगे! इन लोगो से पूछा जाना चाहिए कि इनमे  से कितने सेलेब्रेटी ऐसे है जिन्होंने जाति के आधार पर गाँव स्कूल कोलेज मंदिर या पानी पीने के सार्वजानिक स्थानों पर जातिसूचक अपमान सहन किया हो या तहसील में कई  दिनों तक चक्कर काट काट कर जाति प्रमाण बनवाया हो और फिर भी इंसानियत जाति के तौर पे लिखवाने की हिम्मत करते हो! असल में जाति क्या है इसको वो कभी समझ  नहीं सकता जिसने इसकी प्रताड़ना या अपमान नहीं झेला है! यहाँ तक कि जब भी कोई दलित या  महिला किसी बड़े ओहदे पर पहुचती है तो उनके काम की बजाय जाति और उसके जेंडर की चर्चा ज्यादा होती है! जैसे कि के. जी. बालकृष्णन  देश के पहले दलित सर्वोच्च न्यायाधीश है या पूर्व राष्ट्रपति  के. आर. नारानयन दलित समुदाय से आते है! या ममता बेनर्जी बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री  है उनके कार्यो,विचारों और सोच की कोई वेल्यु  नहीं है इनकी जाति और जेंडर ही इनकी यूसपी है! यहाँ तक अपने आपको प्रोग्रेसिव और लिबरल समझने और बताने वाली मीडिया जमात  में भी दलित और अल्पसंख्यको की बात को समझने वाले कितने लोग है ये बात तो सीसडीस (CSDS) द्वारा  कराये गए अध्ययन से साबित हो गयी है!  

जब देश  का संविधान जातियों के आधार पर समाज का वर्गीकरण  करता है तो जाति और धर्म आधारित  जनगणना में क्या बुराई है पता तो चलना चाहिए कि मनुस्मृती के अनुसार ब्रह्मा जी  के मुख से पैदा होने वाले कितने है और पैरो से पैदा होने वाले कितने है और कौन देश में अल्पसंख्यक और कौन बहुसंख्यक? और इतने सालो तक जिन्होंने देश पर राज किया और जिनके कारण आजादी के इतने सालो बाद भी बहुसंख्यक  लोग नारकीय जिंदगी जी रहे है और कुछ चंद लोग देश के हर संसाधन को लूट रहे है! अमीर और गरीब के बीच खाई बढ़ती जा रही है  जिसके कारण ही आज माओवाद और नक्सलवाद फ़ैल रहा  है!  और  ये भी एक सत्य है कि माओवादियों  के  निचले काडर स्तर पर  ज्यादातर लोग आदवासी और दलित  ही है! और आज लोकतंत्र को चुनोती दे रहे है! दुसरी मेनस्ट्रीम कम्युनिस्ट पार्टियों ने जाति की राजनीती नहीं की इसलिए पूरे उत्तर भारत की राजनीती में निल बटा निल है!

नब्बे के दशक में दो घटनाये ऐसी हुई है जिसने इस देश की राजनीती समाज सबको बदल के रख दिया है जिसमे एक तो वी पी सिंह का मंडल कमिशन द्वारा ओबीसी बनाना और आडवानी एंड फौज का बाबरी मस्जिद गिराना! जिससे देश में जाति और धर्म  को लेकर लोग ज्यादा मुखर हुए है और  बिहार, यूपी जैसे राज्यों में सत्ता सवर्णों के हाथ से गयी! देश में धार्मिक माहोल बिगड़ा! वैसे ये भी एक शोध का विषय हो सकता  है कि अयोध्या कांड में कितने कार  सेवक दलित थे या समाज के निचले तबके से आते थे! ओबीसी क्रियेट होने के बाद ही आरक्षण का मुद्दा गरमा गया है क्योंकि ओबीसी में शामिल जातियों की जनगणना पुराने आंकड़ो पर चल रही है जिससे रोज नए विवाद हो रहे है  यहाँ ये बात भी गौर करने लायक है कि  विभिन जातियों में बेकवार्ड होने की होड़ लगी है वो चाहे राजस्थान में  गुर्जर हो या हरियाणा  में जाट क्योंकि अब आरक्षण का फायदा सबको दिख रहा  है जबकी पहले इन जातियों को अपने को पिछड़े कहलाने में शर्म महसूस होती थी जबकि आज सभी किसी न किसी आरक्षण खांचे में घुसना चाहते  है! और इसका आधार क्या है उस विशेष जाति की जनसँख्या और उनकी आर्थिक सामाजिक परिस्थती! तो इसके लिए इनकी गिनती होनी भी उतनी जरुरी है! जिससे नए आंकड़ो के अनुसार उचित निर्णय  लिया जा सके! नहीं तो देश के कई राज्य कास्ट वार  की कगार पे खड़े है!

 यहाँ ये सोचने वाली बात है कि जिस देश में लोग पानी जाति पूछ के पिलाते हो, ट्रेन में खाना अपनी जाति वाले के साथ शेयर करते हो या गाँव में नाई बाल भी जाति के हिसाब  से काटता है और जहाँ भगवान के दर्शन में भी जाति आड़े आ जाती है उस समाज से जाति को कैसे हटायेंगे?   हाँ ये बात सही  है कि जाति और धर्म  निरपेक्ष समाज होना चाहिए, सोसिअल इक्विलिटी होनी चाहिए! तो ये कौनसी  नयी बात है ये बात तो भगवान बुद्ध,बाबा नानक और कबीर सदियों से कहते आ रहे है और होना भी चाहिए परन्तु इस कीमत पर नहीं कि  इतने समय तक ऊंची जातियों ने इस जाति व्यवस्था का फयदा उठाया  और आज जब पेंडुलम कुछ घूमता दिख  रहा है तो ये लोग जाति रहित समाज की बात करने लगे है! या अपने को पिछड़े साबित करने लगे है! ये तो वो बात हो गयी कि एक आदमी एवरेस्ट पर चढ़ा और नीचे  उतरते समय बाकी  चढने वालों से कह रहा है कि ऊपर मत जाओ वहां कुछ खास नहीं है! जब  जाति और धर्म इस देश और समाज की नस नस में है तो  इससे मुंह फेरना या इससे इंकार करना आँखे बंद करके दिन को रात समझने की भूल करने जैसा ही होगा! 
         

2 टिप्‍पणियां:

globalfakir ने कहा…

जाति आधारित जनगणना जरूरी है

globalfakir ने कहा…

caste census