सतहीपन
आजकल ये शब्द इतना अच्छा लगता है कि
जैसे सबसे "कंटेपररी" शब्द ये ही है
और दुनिया कि हर आदमी और परिस्थिती पर
ये शब्द सटीक बैठता है क्योंकि
सब कुछ सतही है इस दिमाग, और इस दुनिया में
क्योंकि अपना दिमाग ही, अपनी अपनी दुनिया है ना
इतना सतही कि थोडा खोदो तो.
नीचे विचारो और रिश्तो का सीवरेज बह रहा होता है
परन्तु ये ही चीजे गहरी होने पर प्राकृतिक संसाधन बन जाते है
जिनको आने वाली पीढ़िया "माइनिंग" द्वारा खोदेगी
और उम्मीद ही कि कुछ "वेल्यूबल" बन के निकलेगा
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें